‘प्रभु राम की सेवा ही मेरा धर्म’—हनुमान जी की भक्ति ने जीता सबका मन, पंडित तारकेश्वर मिश्रा ने सुनाया अद्भुत प्रसंग
पंडित तारकेश्वर मिश्रा के साथ हनुमान जी के समर्पण, पराक्रम और भक्ति की कथा का चर्चा, बोले—माता-पिता की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं


न्यूज़ विज़न। बक्सर
प्रभु श्रीराम और पवन पुत्र हनुमान के मिलन तथा हनुमान जी की अद्भुत भक्ति का प्रसंग सुनाते हुए पंडित तारकेश्वर मिश्रा ने हनुमान जी के समर्पण, पराक्रम और प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति का विस्तार से वर्णन किया। पंडित तारकेश्वर मिश्रा ने प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब पवन पुत्र महावीर हनुमान प्रभु श्रीराम के पास पहुंचे तो उनके चरणों में गिर पड़े। प्रभु श्रीराम ने प्रेमपूर्वक उन्हें उठाया और पूछा कि हे हनुमान, आप क्या चाहते हैं? हनुमान जी अंतर्यामी प्रभु के मन की बात जानते हुए भी विनम्रता से बोले कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए। वे केवल प्रभु श्रीराम के सेवक और भक्त बनकर उनकी कृपा तथा आदेश के अनुसार जीवन समर्पित करना चाहते हैं।
कथा के अनुसार, प्रभु श्रीराम ने जब नर और वानर के संबंध को लेकर प्रश्न किया तो हनुमान जी ने कहा कि उनका जन्म वानर कुल में प्रभु की ही कृपा से हुआ है। मनुष्य संसार में अपने स्वार्थ और मतलब के अनुसार साथ देता है, लेकिन वे जीवनभर प्रभु श्रीराम का साथ निभाएंगे। प्रभु की कृपा, शक्ति और आदेश से वे उनके सभी कार्यों को पूरा करेंगे। हनुमान जी के मुख से निकली भक्ति और समर्पण की इन बातों से प्रभु श्रीराम भावुक हो उठे और उन्होंने हनुमान जी को अपने हृदय से लगा लिया। पंडित जी ने कहा कि यही वह क्षण था, जब हनुमान जी की भक्ति, निष्ठा और समर्पण का अनुपम स्वरूप सामने आया।
हनुमान जी के पराक्रम का किया वर्णन
पंडित तारकेश्वर मिश्रा ने कहा कि महावीर हनुमान केवल भक्ति और सेवा के प्रतीक ही नहीं, बल्कि अद्भुत पराक्रम और शक्ति के भी प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि हनुमान जी ने अपने सीने को चीरकर यह दिखाया कि उनके हृदय में प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण का वास है। बचपन में सूर्य को फल समझकर उसे निगलने का प्रसंग हो या लक्ष्मण जी के प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाने हेतु पूरा पर्वत उठा लेने की कथा—हनुमान जी का प्रत्येक प्रसंग उनकी अद्भुत शक्ति और प्रभु के प्रति समर्पण को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि हनुमान जी ने युगों-युगों तक प्रभु श्रीराम की सेवा करने का संकल्प लिया। उनकी भक्ति हमें यह संदेश देती है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होती, बल्कि सेवा, समर्पण, त्याग और कर्तव्य पालन में भी दिखाई देती है।
‘माता-पिता की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं’
पंडित तारकेश्वर मिश्रा ने धर्म और संस्कार के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “धर्म की खेती मन की अच्छाई से होती है, जैसे फसल की खेती धरती माता से होती है।” उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने जीवन में अच्छे विचारों, सेवा भाव और संस्कारों को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि माता-पिता की सेवा करना सबसे बड़ा धर्म है। चारों धाम की यात्रा से भी बढ़कर माता-पिता की सेवा को महत्व देते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने माता-पिता की सेवा और सम्मान करता है, वह वास्तविक अर्थों में धर्म के मार्ग पर चलता है।
पंडित जी ने गौ सेवा और नियमित हनुमान चालीसा के पाठ को भी जीवन का आधार बताते हुए श्रद्धालुओं से धार्मिक आस्था के साथ-साथ मानव सेवा, माता-पिता की सेवा और अच्छे आचरण को अपने जीवन में अपनाने की अपील की। हनुमान जी की भक्ति और पराक्रम के प्रसंगों ने भक्तिमय वातावरण बना दिया।





