भागवत महापुराण सभी धर्म शास्त्रों ,वेदों, पुराणों, स्मृतियों का सार कृति है: आचार्य पौराणिक जी
श्री रामेश्वर नाथ मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का रसपान के लिए श्रद्धालुओं की जु रही भीड़


न्यूज विजन। बक्सर
रामरेखा घाट स्थित श्री रामेश्वर नाथ मंदिर परिसर में सर्वजन कल्याण सेवा समिति सिद्धाश्रम धाम बक्सर द्वारा आयोजित 18वां धर्म आयोजन के चौथे दिन आचार्य कृष्णानंद शास्त्री पौराणिक जी ने कहा कि भागवत महापुराण सभी धर्म शास्त्रों ,वेदों, पुराणों, स्मृतियों का सार कृति है। यह चिंतामणि के समान है। जो कोई भी मानव इस महापुराण से याचना करता है तो उसे वह अभीष्ट अवश्य प्राप्त होता है। प्राप्त करने योग्य समस्त सृष्टि में चार ही हैं। पहला धर्म, दूसरा अर्थ, तीसरा काम और चौथा मोक्ष। इन चारों में अपने संस्कार एवं रुचि के अनुसार जो व्यक्ति जो मांगता है उसे वही मिलता है। जो मुंह नहीं खोलता और इसके सानिध्य में रहता है उसे यह ग्रंथ उक्त चारों प्रदान करके उसे कृत-कृत कर देता है।
साधनभक्ति ज्ञान वैराग्य को इस भागवत ने अर्थ और काम प्रदान किया, जबकि परीक्षित महाराज को मोक्ष प्रदान किया। पांडवों को अपना सर्वस्व धर्म, अर्थ काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान कर अपने नाम की लाज बचाई है। भागवत जी ने कुंती को भक्ति तथा भीष्म को शक्ति एवं समस्त भक्तों को मुक्ति दिया है । यह ग्रंथ इस कलयुग के लिए अमोघ अस्त्र बनाकर सारी सृष्टि का भरण पोषण करते हुए सभी का परम कल्याण करते हुए अपने पथ का विस्तार कर रहा है।
सभी आध्यात्मिक शास्त्रों का सार होने के कारण एकमात्र भागवत कथा श्रवण कर लेने से ही चारों वेदों स्मृतियां पुराणों तथा सभी धर्म शास्त्रों के श्रवण करने का फल मिल जाता है। इस ग्रंथ में भगवान के 24 मुख्यतम अवतारों की कथा बताए गए हैं। 14 रतन की प्राप्ति के साथ ही सूर्य वंश एवं चंद्र वंश के दिव्य चरित्र का यश गान किया गया है। श्री कृष्ण के अवतार से लेकर परलोक गमन तक का उज्जवल यशो का आख्यान है। यह बताया गया है कि व्यक्ति की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह येन केन प्रकारेण अपने मन को संसार की वस्तु में जो भवसागर में डूबने वाली है उनसे अपने मन को हटाकर भगवान के श्री चरणों में लगा ले। मानव का परम लक्ष्य मोक्ष होना चाहिए और वह मोक्ष भगवान की भक्ति के बिना संभव नहीं है।
धन केवल शरीर की आवश्यकताओं का पूरक है, यह परलोक का साथी नहीं है। काम केवल स्वस्थ शरीर तक ही संसार सुख में हेतु है अशक्त शरीर की कामनाएं व्यर्थ होती हैं। धर्म दो तरह का होता है। पहले तन-मन से दूसरा धन-मन से। दोनों ही धर्म मोक्ष में सहायक होता है। भागवत की यही सीख है कि मनुष्य धन एवं काम को सीमित करते हुए धर्म द्वारा मोक्ष तत्व की प्राप्ति करने हेतु उद्योग करें। मोक्ष ही जीवन मंत्र के परम कल्याण का सार सर्वस्व है, जिसके संबंध में महा ज्ञानी भरत एवं अन्य राजाओं की कथा के माध्यम से उपरोक्त रहस्यों का उद्घाटन किया गया है।





