‘जलसमाधि’ के प्रथम श्रोता बने बक्सर के बौद्धिक वर्ग, साहित्य के जरिए इतिहास को जीवंत कर रहे प्रो. देवेंद्र चौबे
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि पर केंद्रित है नई कृति ‘जलसमाधि’, कथकौली के युद्ध और ग्रामीण क्रांतिकारियों का भी सजीव चित्रण

न्यूज़ विज़न। बक्सर
शनिवार को बक्सर के साहित्यिक और बौद्धिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया, जब प्रख्यात लेखक एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कार्यरत प्रो. देवेंद्र चौबे की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘जलसमाधि’ का प्रथम पाठ बक्सर के बुद्धिजीवियों और साहित्यप्रेमियों के बीच हुआ। मूल रूप से बक्सर जिले के अहिरौली निवासी प्रो. देवेंद्र चौबे अपनी रचनाओं के माध्यम से बक्सर के इतिहास, संस्कृति, परंपरा और यहां के संघर्षों को साहित्य के माध्यम से सहेजने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
‘जलसमाधि’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि पर केंद्रित कथा है। पुस्तक में स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की घटनाओं, जनभावनाओं और संघर्षों को कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। प्रो. चौबे ने इस अवसर पर कहा कि महात्मा गांधी की सबसे बड़ी शक्ति उनकी नैतिकता थी। इसी नैतिक शक्ति ने स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन और दिशा प्रदान की। कार्यक्रम में प्रो. देवेंद्र चौबे ने अपनी पुस्तक के उस अंश का पाठ किया, जिसमें कथकौली मैदान के युद्ध तथा सन्यासी बाबा के साथ ग्रामीणों की आंदोलन में सहभागिता का वर्णन है। उपन्यास में युद्ध के घटनाक्रम का सजीव चित्रण किया गया है। वहीं गोदी अहीर जैसे सामान्य क्रांतिकारियों के संघर्ष और योगदान को भी रचना में जीवंत रूप दिया गया है। इतिहास के इन अनकहे और कम चर्चित पहलुओं को साहित्य के माध्यम से पढ़ना श्रोताओं के लिए बेहद रोमांचकारी अनुभव रहा।
प्रो. देवेंद्र चौबे का मानना है कि बक्सर ने इतिहास में कई महत्वपूर्ण युद्ध और संघर्ष देखे हैं। इनमें से कुछ घटनाओं के लिखित दस्तावेज उपलब्ध हैं, लेकिन अनेक प्रसंग लोकस्मृति, सामाजिक चेतना और रचनाकारों की स्मृतियों में दर्ज हैं। उनके साहित्य में इन्हीं ऐतिहासिक स्मृतियों को नई अभिव्यक्ति मिलती है। यही कारण है कि उनकी रचनाएं केवल साहित्य नहीं, बल्कि बक्सर के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समझने का माध्यम भी बन रही हैं। प्रो. चौबे की चर्चित पुस्तक ‘1764 तथा अन्य कहानियाँ’ भी बक्सर के इतिहास और 1764 के ऐतिहासिक युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है। बक्सर का यह युद्ध भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और इसने भारत में ब्रिटिश सत्ता की जड़ों को मजबूत करने में निर्णायक भूमिका निभाई। उनकी कहानी ‘1764’ का अंग्रेजी अनुवाद मॉरीशस की लेखिका डॉ. देविना अक्षयवर ने साहित्य अकादमी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘इंडियन लिटरेचर’ में वर्ष 2016 में किया था।
प्रो. देवेंद्र चौबे एक शोध-अध्येता की तरह देश-विदेश की यात्राएं करते हुए इतिहास और समाज के विभिन्न पहलुओं को समझते हैं तथा उन्हें साहित्य की विधा में ढालने का प्रयास करते हैं। उनकी रचनाओं में इतिहास केवल घटनाओं का विवरण नहीं रह जाता, बल्कि पात्रों, संघर्षों और संवेदनाओं के माध्यम से जीवंत अनुभव में बदल जाता है। ‘जलसमाधि’ आधार प्रकाशन, पंचकूला से शीघ्र प्रकाशित होने वाली है। पुस्तक के प्रथम श्रोता बनने का अवसर बक्सर के साहित्यप्रेमियों और बौद्धिक वर्ग के लिए गौरव और सौभाग्य का विषय रहा। भोजपुरी साहित्य मंडल, बक्सर ने प्रो. देवेंद्र चौबे के मंगलमय भविष्य की कामना करते हुए उन्हें निरंतर सृजनशील बने रहने की शुभकामनाएं दीं।
कार्यक्रम का संयोजन बक्सर स्कूल ऑफ हिस्ट्री के डॉ. शशांक शेखर ने किया। इस अवसर पर भोजपुरी साहित्य मंडल के महासचिव डॉ. वैरागी प्रभाष चतुर्वेदी, श्री मृत्युंजय सिंह, डॉ. शेखर, श्री अभय तिवारी सहित अन्य साहित्यप्रेमी, बुद्धिजीवी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।




