ऊखल बंधन से ताड़का वध तक, रामलीला मंच पर सजी कृष्ण-राम की मनोहारी लीलाएं
विजयादशमी महोत्सव के तीसरे दिन भावपूर्ण मंचन ने मोहा दर्शकों का मन, देर रात तक ‘जय श्रीराम’ के जयघोष से गूंजता रहा रामलीला मैदान

न्यूज विज़न। बक्सर
श्री रामलीला समिति, बक्सर के तत्वावधान में ऐतिहासिक रामलीला मैदान स्थित विशाल रामलीला मंच पर चल रहे 20 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के तीसरे दिन बुधवार को श्रीकृष्ण और श्रीराम की लीलाओं का भावपूर्ण मंचन किया गया। श्रीधाम वृंदावन से पधारे सुप्रसिद्ध श्री बाल कृष्ण रासलीला एवं रामलीला मंडल के कलाकारों ने स्वामी श्री मोहन श्याम भारद्वाज के सफल निर्देशन में दिन में श्रीकृष्ण लीला के अंतर्गत ऊखल बंधन लीला तथा रात्रि में श्रीरामलीला के अंतर्गत विश्वामित्र आगमन एवं ताड़का वध प्रसंग का सजीव मंचन किया।
दिन में प्रस्तुत ऊखल बंधन लीला ने दर्शकों को बाल कृष्ण की मनोहारी बाल लीलाओं से भाव-विभोर कर दिया। मंचन में दिखाया गया कि बालक श्रीकृष्ण अपनी बाल-सुलभ शरारतों से माता यशोदा को लगातार परेशान करते हैं। एक दिन माखन की मटकी फोड़कर ग्वाल-बालों के साथ माखन बांटते हुए श्रीकृष्ण को माता यशोदा पकड़ लेती हैं।
माता यशोदा बालक कृष्ण को दंड देने के लिए ऊखल से बांधने का प्रयास करती हैं, लेकिन हर बार रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ जाती है। अंततः माता के प्रेम और अथक प्रयास के आगे भगवान श्रीकृष्ण बंध जाते हैं। इसके बाद बाल कृष्ण ऊखल को खींचते हुए दो विशाल अर्जुन वृक्षों के बीच से निकलते हैं। श्रीकृष्ण के स्पर्श से दोनों वृक्ष धराशायी हो जाते हैं और उनमें से नलकूबर एवं मणिग्रीव नामक दिव्य पुरुष प्रकट होकर भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते हैं। इस लीला के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के प्रति माता यशोदा के वात्सल्य प्रेम और भगवान की भक्तवत्सलता का अद्भुत दर्शन कराया गया।
विश्वामित्र के साथ वन की ओर निकले राम-लक्ष्मण
रात्रि में रामलीला के दौरान विश्वामित्र आगमन एवं ताड़का वध प्रसंग का मंचन हुआ। कथा में दिखाया गया कि महर्षि विश्वामित्र जब यज्ञ करते हैं तो राक्षस बार-बार उसमें विघ्न डालकर यज्ञ को नष्ट करने का प्रयास करते हैं। यज्ञ की रक्षा को लेकर चिंतित महर्षि विश्वामित्र अयोध्या पहुंचते हैं, जहां राजा दशरथ उनका आदरपूर्वक स्वागत करते हैं।
महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ से यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को अपने साथ भेजने का आग्रह करते हैं। पुत्र मोह के कारण राजा दशरथ पहले संकोच करते हैं, लेकिन गुरु वशिष्ठ के समझाने के बाद दोनों राजकुमारों को महर्षि के साथ भेजने के लिए सहमत हो जाते हैं।
माता-पिता से आज्ञा लेकर श्रीराम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ बक्सर के वन क्षेत्र की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में उन्हें आतंक का पर्याय बनी राक्षसी ताड़का का सामना करना पड़ता है। महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्रीराम ताड़का का वध कर उसका उद्धार करते हैं।
इसके बाद महर्षि विश्वामित्र दोनों भाइयों को दिव्य अस्त्र-शस्त्र एवं विभिन्न प्रकार की शस्त्र विद्याओं का ज्ञान प्रदान करते हैं। यज्ञ शुरू होने के बाद राक्षस मारीच और सुबाहु यज्ञ में विघ्न डालने पहुंचते हैं। श्रीराम अपने बाण से मारीच को दूर समुद्र पार भेज देते हैं, जबकि सुबाहु का वध कर यज्ञ की रक्षा करते हैं।
कलाकारों के अभिनय ने बांधा समां
रामलीला के दौरान कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय, प्रभावशाली संवाद, संगीत और आकर्षक मंचीय प्रस्तुति ने दर्शकों को धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण से जोड़ दिया। ताड़का वध और यज्ञ रक्षा के प्रसंगों के दौरान दर्शकों में विशेष उत्साह देखने को मिला।
मंचन समाप्त होने तक रामलीला मैदान श्रद्धालुओं से भरा रहा। देर रात तक दर्शक ‘जय श्रीराम’ के जयघोष से पूरे परिसर को गुंजायमान करते रहे। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं एवं दर्शकों ने कृष्ण लीला और रामलीला के मंचन का आनंद लिया तथा धार्मिक कथा के माध्यम से भक्ति और संस्कारों से जुड़ने का अनुभव किया।




