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पीएम के जन्मदिन पर लेखक मुरली का ‘मोदी युग का भारत’ पुस्तक का तोहफा, विकास, नीतियों और 2047 के भारत को दिया आकार

डुमरांव की धरती से निकली मुरली की कलम ने प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर उन्हें फूलों या स्मृति-चिह्न के बजाय शब्दों का ऐसा तोहफा दिया है, जिसमें बीते 12 वर्षों का लेखा-जोखा, वर्तमान भारत की तस्वीर और 2047 के भविष्य का सपना-तीनों एक साथ दिखाई देते हैं

न्यूज़ विज़न।  पटना /बक्सर 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर बिहार के बक्सर जिले के डुमरांव निवासी प्रसिद्ध लेखक और वरिष्ठ पत्रकार मुरली मनोहर श्रीवास्तव ने एक ऐसी पुस्तक को पाठकों के सामने रखा है, जो मौजूदा दौर की विकास यात्रा, नीतिगत बदलावों और भविष्य के भारत की परिकल्पना को दस्तावेजी रूप में सामने लाने का प्रयास करती है। पुस्तक का नाम है- ‘मोदी युग का भारत’। यह पुस्तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के पिछले 12 वर्षों में किए गए विकासात्मक कार्यों, नीतिगत फैसलों और उनके व्यापक प्रभावों पर केंद्रित है। लेखक ने इसे महज सरकारी योजनाओं और आंकड़ों का संकलन बनाने के बजाय विभिन्न क्षेत्रों में हुए बदलावों को विषय की गहराई, उपलब्ध तथ्यों और उनके प्रभाव के साथ समझाने की कोशिश की है। पुस्तक में विकास की उस तस्वीर को सामने लाने का प्रयास किया गया है, जिसमें एक ओर ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए देश को विनिर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश दिखाई देती है, तो दूसरी ओर डिजिटल क्रांति की पहुंच देश के सुदूर गांवों तक होती नजर आती है। महिला सशक्तीकरण, बुनियादी ढांचे का विस्तार, बदलती अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका जैसे विषयों को भी पुस्तक में प्रमुखता दी गई है।

 

योजनाओं से आगे बढ़कर प्रभाव का विश्लेषण

‘मोदी युग का भारत’ की खासियत यह बताई गई है कि इसमें सरकारी योजनाओं की सूची प्रस्तुत करने के बजाय उनके प्रभाव और व्यापक संदर्भ को समझने का प्रयास किया गया है। लेखक श्री मुरली ने यह देखने की कोशिश की है कि नीतियों और योजनाओं का असर देश के आम नागरिक, गांव, युवा, महिलाएं और आर्थिक गतिविधियों पर किस तरह पड़ा। ‘मेक इन इंडिया’ को पुस्तक में केवल एक नारे या औद्योगिक नीति के रूप में नहीं बल्कि भारत की उत्पादन क्षमता, रोजगार और आत्मनिर्भरता से जोड़कर देखने का प्रयास किया गया है। इसी तरह डिजिटल क्रांति को भी महज तकनीकी परिवर्तन नहीं माना गया है। लेखक के अनुसार, डिजिटल तकनीक ने सरकारी सेवाओं, बैंकिंग, भुगतान और सूचना तक आम लोगों की पहुंच को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिला सशक्तीकरण भी है। इसमें जमीनी स्तर पर महिलाओं की बदलती भूमिका और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने वाली पहलों को रेखांकित किया गया है। लेखक का प्रयास यह दिखाना है कि विकास की कहानी तभी पूरी मानी जा सकती है, जब समाज के अलग-अलग वर्गों की भागीदारी उसमें सुनिश्चित हो।

 

विदेश नीति और वैश्विक मंच पर बदलता भारत

‘मोदी युग का भारत’ पुस्तक में भारत की विदेश नीति और वैश्विक स्तर पर देश की बदलती छवि को भी प्रमुख विषय बनाया गया है। पुस्तक इस बात पर केंद्रित है कि पिछले वर्षों में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी भूमिका को किस प्रकार मजबूत किया और वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा कूटनीति में अपनी उपस्थिति को अधिक प्रभावी बनाया। लेखक ने विदेश नीति को केवल राजनयिक बैठकों और समझौतों तक सीमित रखने के बजाय इसे भारत की वैश्विक छवि और राष्ट्रीय हितों से जोड़कर देखने की कोशिश की है। पुस्तक यह सवाल भी सामने रखती है कि नीतिगत फैसलों और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों ने भारत को वैश्विक पटल पर किस तरह नई पहचान देने में भूमिका निभाई।

पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय-2047 का भारत

‘मोदी युग का भारत’ का सबसे दिलचस्प और भविष्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण हिस्सा वह है, जहां लेखक 2047 के भारत की तस्वीर सामने रखने का प्रयास करते हैं। भारत की आजादी के 100 वर्ष पूरे होने पर 2047 में देश कैसा होगा-यह सवाल आज की युवा पीढ़ी के लिए जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही नीति-निर्माताओं के लिए भी। पुस्तक में इसी भविष्य को वर्तमान नीतियों और फैसलों के संदर्भ में समझाने का प्रयास किया गया है। लेखक का मानना है कि आज लिए जा रहे नीतिगत फैसले आने वाले दशकों के भारत की दिशा तय करेंगे। इसी सोच के आधार पर पुस्तक पाठकों को यह समझने का अवसर देती है कि बुनियादी ढांचे, तकनीक, विनिर्माण, महिला भागीदारी, आर्थिक विकास, वैश्विक कूटनीति और आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में किए जा रहे प्रयास किस प्रकार भारत को 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में ले जा सकते हैं। इस लिहाज से यह पुस्तक केवल वर्तमान का दस्तावेज नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं को समझने का एक प्रयास भी बन जाती है।

मुरली मनोहर श्रीवास्तव की लेखकीय यात्रा

मुरली मनोहर श्रीवास्तव की लेखकीय यात्रा किसी एक विषय तक सीमित नहीं रही है। इतिहास, राजनीति, संस्कृति और समकालीन भारत से जुड़े अलग-अलग विषयों पर उन्होंने लेखन किया है। भारत रत्न और शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के जीवन पर उन्होंने ‘शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां’, 1857 के गदर के वीर सेनानी वीर कुंवर सिंह के जीवन से जुड़े पहलुओं को उन्होंने ‘वीर कुंवर सिंह की प्रेमकथा’ पुस्तक लिखी। वहीं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर उनकी पुस्तक ‘विकास पुरुष’ भी चर्चा में रही है। इसके अलावा राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और बिहार गीत जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ‘वंदेमातरम्’ पुस्तिका का संपादन भी उन्होंने किया है। इन रचनाओं को देखें तो श्रीवास्तव के लेखन में एक समान सूत्र दिखाई देता है-ऐसे विषयों को सामने लाना, जिनका सामाजिक, ऐतिहासिक या समकालीन महत्व हो और जिनसे आने वाली पीढ़ी को कुछ सीख मिल सके।

‘आलोचना से बेहतर खासियत को आत्मसात करना’

मुरली मनोहर श्रीवास्तव का लेखन-दर्शन भी उनकी पुस्तकों की विषय-वस्तु को समझने में महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि किसी व्यक्ति की केवल आलोचना करने के बजाय उसकी अच्छी विशेषताओं को समझना और आत्मसात करना अधिक सार्थक है। इसी सोच को वे अपने लेखन से जोड़ते हैं। उनके लिए किसी व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था पर लिखने का अर्थ केवल प्रशंसा या आलोचना करना नहीं, बल्कि उसके काम, उपलब्धियों, कमियों और प्रभाव को समझने की कोशिश करना है।
उनका मानना है कि देश के किसी भी स्तर पर हो रहे विकास और समाज के अनछुए पहलुओं पर काम करना लेखकीय प्राथमिकता होनी चाहिए। वे ऐसे विषय चुनना चाहते हैं, जिनमें आने वाली युवा पीढ़ी के लिए सीख, प्रेरणा और विचार की गुंजाइश हो।

बिहार से राष्ट्रीय विमर्श तक

डुमरांव जैसे ऐतिहासिक शहर से निकलकर राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर लगातार लेखन करना मुरली मनोहर श्रीवास्तव की रचनात्मक यात्रा का महत्वपूर्ण पक्ष है। उनकी पुस्तकों में बिहार की ऐतिहासिक और राजनीतिक विरासत से लेकर राष्ट्रीय स्तर के समकालीन मुद्दों तक का विस्तार दिखाई देता है। ‘मोदी युग का भारत’ इसी क्रम में उनकी नवीनतम कड़ी के रूप में सामने आती है। इस पुस्तक के जरिए उन्होंने समकालीन भारत के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और विकासात्मक दौर को दर्ज करने का प्रयास किया है। पुस्तक का केंद्रीय विचार यही है कि किसी भी दौर को समझने के लिए केवल घटनाओं को दर्ज करना पर्याप्त नहीं है। उन घटनाओं के पीछे की नीतियों, उनके प्रभाव और भविष्य पर पड़ने वाले संभावित असर को भी समझना जरूरी है।

युवाओं के लिए दस्तावेज बनने की कोशिश
श्रीवास्तव की दृष्टि में लेखन का अंतिम उद्देश्य केवल पुस्तक प्रकाशित करना नहीं, बल्कि पाठक को सोचने के लिए सामग्री देना है। ‘मोदी युग का भारत’ में वर्तमान की विकास यात्रा से लेकर 2047 के संभावित भारत तक की चर्चा इसी उद्देश्य को सामने रखती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर पुस्तक को एक विशेष तोहफे के रूप में प्रस्तुत करते हुए लेखक ने इसे एक ऐसे दस्तावेज का स्वरूप देने की कोशिश की है, जिसमें बीते 12 वर्षों की नीतियों और विकास कार्यों के साथ भविष्य के भारत की कल्पना भी मौजूद है। इतिहास, राजनीति और विकास के बदलते संदर्भों को दर्ज करने की लेखक की परंपरा में ‘मोदी युग का भारत’ एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ती है। यह पुस्तक जहां मौजूदा दौर की विकास नीतियों को समझने का प्रयास करती है, वहीं पाठकों को यह सोचने के लिए भी प्रेरित करती है कि आज के फैसले आने वाले भारत की तस्वीर को किस तरह आकार दे सकते हैं।

 

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