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मानस रोग की दवा केवल धर्म शास्त्रों में ही है: आचार्य पौराणिक जी

श्री रामेश्वर नाथ मंदिर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य श्री ने दैहिक और मानस रोग के बारे में किया विस्तार से वर्णन

न्यूज विजन। बक्सर

सर्वजन कल्याण सेवा समिति सिद्धाश्रम धाम बक्सर की ओर से श्री रामेश्वर नाथ मंदिर में आयोजित 18 में धर्म आयोजन के तहत बुधवार को आचार्य पौराणिक जी ने श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का श्रवण कराया। उन्होंने कहा कि मनुष्य मात्र को दो तरह के रोगों का भय होता है, प्रथम दैहिक और दूसरा मानसिक रोग। देह भौतिक है अतः दैहिक रोग का इलाज डॉक्टर से दिखाकर दवाइयां का सेवन करने से ठीक किया जाता है। देह के रोग की पहचान की अनेक विधियां होती है जिन्हें देखकर, स्पर्श कर, जांच कर और पूछ कर जाना जा सकता है। इलाज की विधि व्यवस्था करके रोग का निदान संभव है।

 

 

उन्होंने कहा कि मानस रोग ऐसे कष्टप्रद भयंकर रूप है कि इसकी दवा केवल धर्म शास्त्रों में ही है। आध्यात्मिक चिकित्सा ही एकमात्र उपाय है। यह मानस रोग है मोह, काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष आदि। इसमें लोभ सभी पापों अत्याचार एवं अनीति की जननी एवं जनक है। लोभ भविष्य के लिए वर्तमान में जन्म लेने वाला वह कुविचार है जो भूत, भविष्य एवं वर्तमान तीनों को कलंकित कर देता है। लोभ का परिणाम नाश होता है। लोभ ज्यों ही मन में आता है उसी क्षण मनुष्य राक्षस बन जाता है।

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि महात्मा कश्यप के पुत्र हिरण्याक्ष के मन में यह लोभ आया और इसके आते ही समस्त रतन एवं स्वर्ण आदि धातुओं को अपना बनाना चाहा। जब उसे पता चला कि यह सारी चीज पृथ्वी में ही है तो उसने वसुंधरा भूमि का ही हरण कर लिया और अपने लोक सुतल लोक में पृथ्वी को छिपा दिया। आज तक सृष्टि में ऐसा कोई लोभी नहीं हुआ जो पृथ्वी का हरण किया हो, किंतु भगवान नारायण को यह अच्छा नहीं लगा और उन्होंने सुकर का रूप धारण कर हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी का दान सृष्टि के लिए किया, जिस धरा पर आज समस्त दुनिया बसी हुई है। मरते समय वह लोभी हिरण्याक्ष एक तिनका भी नहीं ले जा सका।

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि परीक्षित को श्री सुखदेव जी ने बताया कि आज मानव समाज में जो अशांति है उसके पीछे यह मानसिक रोग लोभ ही है। आज समाज के प्रत्येक व्यक्ति को स्वार्थ ने इतना विवश कर दिया है कि मानव मूल्य का समूल नाश होता जा रहा है। चारों तरफ झूठ, कपट पाखंड, एवं पाप कर्म ही दिखाई देने लगा है। एक दूसरे को प्रत्येक आदमी मूर्ख बनाने तथा उससे मिलकर उसी का धन हड़पने में लगा हुआ है। प्रत्येक आदमी भेड़िया बन गया है। कोई नेता बनकर जन सेवा के नाम पर, कोई साधु बनकर धर्म एवं यज्ञ के नाम पर तो कोई विद्वान बनकर कथा के नाम पर ।
सारी दुनिया बल, धन, पद, पैसा, प्रतिष्ठा एवं ख्याति की दासी बन गई है। श्रीमद्भागवत कथा इसी लोभ का इलाज है। इस कथा के सुनने से व्यक्ति को संसार की सच्चाई का पता चल जाता है, जिसे जानने के बाद मनुष्य परम परमार्थ की दुनिया में जीवन जीने लगता है। यह भागवत कथा सभी मानस रोगों की अचूक दवा है ।

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