अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में बक्सर के शोधार्थियों ने बढ़ाया जिले का गौरव
स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, जनजातीय विरासत और सांस्कृतिक निरंतरता पर हुआ अकादमिक विमर्श, अविनाश कुमार समेत छह शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए शोध-पत्र


न्यूज़ विज़न। बक्सर/प्रयागराज
भारत में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के पुनरोद्धार, जनजातीय विरासत, सांस्कृतिक निरंतरता एवं सामाजिक परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में बक्सर जिले के शोधार्थियों ने सक्रिय सहभागिता करते हुए अपने शोध-पत्रों का प्रस्तुतीकरण किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर के इस अकादमिक मंच पर बक्सर के शोधार्थियों की सहभागिता को जिले की शैक्षणिक एवं शोध गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “भारत में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों का पुनरुद्धार: जनजातीय विरासत, सांस्कृतिक निरंतरता और सामाजिक परिवर्तन” विषय पर 11 एवं 12 सितंबर 2026 को आयोजित की गई। संगोष्ठी का आयोजन जनजाति अध्ययन केंद्र, ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज, प्रयागराज द्वारा किया गया। कार्यक्रम का आयोजन हाइब्रिड माध्यम से किया गया, जिसमें ऑफलाइन एवं ऑनलाइन दोनों माध्यमों से शोधार्थियों और विषय विशेषज्ञों ने सहभागिता की। संगोष्ठी में बक्सर जिले से शोधार्थी अविनाश कुमार वर्मा, विशाल कुमार चौधरी, विश्वकर्मा यादव, विश्वकर्मा कुमार, राजू कुमार गुप्ता एवं कुमार निहाल ने शोधार्थी के रूप में सहभागिता की। सभी शोधार्थियों ने संगोष्ठी के केंद्रीय विषय से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने शोध एवं विचार प्रस्तुत करते हुए अकादमिक विमर्श में योगदान दिया।
स्वदेशी ज्ञान परंपराओं की प्रासंगिकता पर अविनाश कुमार ने रखा पक्ष
संगोष्ठी के दौरान शोधार्थी अविनाश कुमार वर्मा का प्रस्तुतीकरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने भारतीय स्वदेशी एवं जनजातीय ज्ञान परंपराओं की महत्ता, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा बदलते सामाजिक परिवेश में इन ज्ञान प्रणालियों की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। अपने प्रस्तुतीकरण में उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां केवल अतीत की विरासत नहीं हैं, बल्कि इनमें प्रकृति, समाज, संस्कृति और जीवन-पद्धति से जुड़े अनुभवजन्य ज्ञान का व्यापक भंडार मौजूद है। यह ज्ञान आज के बदलते सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश में भी उपयोगी साबित हो सकता है।
उन्होंने जनजातीय समुदायों की पारंपरिक जीवन-पद्धति, प्रकृति के साथ उनके सामंजस्य, लोकज्ञान एवं सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास की प्रक्रिया में स्थानीय एवं स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को साथ लेकर चलना जरूरी है। इससे न केवल सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण संभव होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक इन परंपराओं और ज्ञान को प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सकेगा। अविनाश कुमार ने इस बात पर भी जोर दिया कि आधुनिक शिक्षा एवं विकास की अवधारणाओं के साथ स्थानीय ज्ञान को जोड़कर सांस्कृतिक निरंतरता, सामाजिक समावेशन और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर बक्सर की अकादमिक उपस्थिति
बक्सर के छह शोधार्थियों की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में सहभागिता को जिले में उच्च शिक्षा और शोध के प्रति बढ़ती रुचि का संकेत माना जा रहा है। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के अकादमिक मंचों पर जिले के शोधार्थियों की भागीदारी से बक्सर की शैक्षणिक पहचान को भी मजबूती मिलती है। शोधार्थियों की इस सहभागिता से यह संदेश भी सामने आया कि बक्सर जैसे जिले के युवा शोधकर्ता स्थानीय एवं राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर गंभीर अध्ययन कर अंतरराष्ट्रीय अकादमिक विमर्श में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
स्वदेशी ज्ञान, जनजातीय विरासत और सांस्कृतिक परंपराओं जैसे विषय वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण बन रहे हैं। ऐसे में बक्सर के शोधार्थियों द्वारा इन विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत करना जिले के लिए गौरव का विषय है और इससे भविष्य में शोध एवं उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खुलने की उम्मीद बढ़ी है।





