रामलीला मंच पर ताला लगाने से चौसा में गरमाया माहौल, 102 साल पुरानी परंपरा पर उठे सवाल
साक्षरता भवन सह रामलीला मंच पर ईओ की तालाबंदी से भड़के स्थानीय लोग, जमकर नारेबाजी; प्रशासन ने समझाने का किया प्रयास, ईओ बोलीं- ‘सनातन विरोधी नहीं, जानबूझकर मामले को दिया जा रहा तूल’

न्यूज़ विज़न। बक्सर/चौसा
बक्सर जिले के चौसा नगर पंचायत अंतर्गत चौसा बाजार स्थित साक्षरता भवन सह रामलीला मंच पर कार्यपालक पदाधिकारी रानी कुमारी द्वारा ताला लगाए जाने के बाद विवाद गहरा गया। 102 साल पुरानी रामलीला परंपरा के बीच मंच पर तालाबंदी की कार्रवाई से स्थानीय लोगों में आक्रोश फैल गया। देखते ही देखते बड़ी संख्या में लोग मौके पर जुट गए और कार्यपालक पदाधिकारी के खिलाफ नारेबाजी करते हुए कार्रवाई पर सवाल उठाने लगे। लोगों ने आरोप लगाया कि रामलीला जैसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन के बीच मंच पर ताला लगाना उनकी धार्मिक आस्था और सनातन परंपरा के साथ हस्तक्षेप है।
स्थानीय लोगों के अनुसार चौसा में वर्ष 1925 से रामलीला मंचन की परंपरा चली आ रही है। इस वर्ष भी पांच दिनों तक रामलीला का मंचन हो चुका है, जबकि चार दिन का आयोजन अभी बाकी है। ऐसे में आयोजन के बीच रामलीला मंच पर ताला लगाए जाने से लोगों का गुस्सा भड़क गया। लोगों ने सवाल उठाया कि जब वर्षों से इसी स्थान पर रामलीला का आयोजन होता आ रहा है और नगर पंचायत बनने के बाद भी पिछले कई वर्षों से आयोजन शांतिपूर्ण तरीके से होता रहा है, तो अचानक तालाबंदी की जरूरत क्यों पड़ी।
मौके पर पहुंची पुलिस, लोगों ने की ईओ को बुलाने की मांग
हंगामे की सूचना मिलने के बाद मुफस्सिल थानाध्यक्ष शंभू भगत पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और आक्रोशित लोगों को समझाने का प्रयास किया। पूर्व मुखिया बृज बिहारी सिंह सहित स्थानीय जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता भी मौके पर पहुंच गए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए नगर पंचायत के कर्मी और थानाध्यक्ष चाबी लेकर ताला खुलवाने पहुंचे, लेकिन आक्रोशित लोगों ने कार्यपालक पदाधिकारी को मौके पर बुलाने और तालाबंदी की कार्रवाई के लिए स्पष्टीकरण देने की मांग की।
लोगों का कहना था कि केवल ताला खोल देना समस्या का समाधान नहीं है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि रामलीला के बीच मंच पर ताला लगाने का निर्णय किस आधार पर लिया गया और इसके पीछे वास्तविक वजह क्या थी।
पूर्व मुखिया बोले- रामलीला चौसा की पहचान
पूर्व मुखिया बृज बिहारी सिंह ने कार्रवाई को निंदनीय बताते हुए कहा कि चौसा की रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान है। वर्ष 1925 से चली आ रही यह परंपरा लोगों की धार्मिक आस्था, संस्कृति और गौरव से जुड़ी हुई है।
उन्होंने सवाल उठाया कि रामलीला मंच पर ताला लगाने का आदेश किसने दिया और किस आधार पर दिया गया। उनका कहना था कि किसी भी प्रशासनिक निर्णय से पहले आयोजकों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से बातचीत की जानी चाहिए थी। धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन से जुड़े मामले में संवाद के माध्यम से समाधान निकालना अधिक उचित होता।
जनप्रतिनिधि ने कहा- चार साल से शांतिपूर्ण हो रहा आयोजन
उपमुख्य पार्षद प्रतिनिधि विकास राज ने कहा कि कार्यपालक पदाधिकारी को तालाबंदी से पहले नगर पंचायत के जनप्रतिनिधियों और रामलीला आयोजकों से बातचीत करनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि नगर पंचायत बनने के बाद पिछले चार वर्षों से यहां रामलीला का आयोजन शांतिपूर्ण तरीके से होता आ रहा है। इस बार भी पांच दिनों तक रामलीला का मंचन हो चुका था, ऐसे में अचानक मंच पर ताला लगाए जाने की कार्रवाई समझ से परे है। उन्होंने आशंका जताई कि दुर्गापूजा के दौरान इस तरह की कार्रवाई से पहले से बने धार्मिक माहौल पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
स्थानीय लोगों ने भी जताई नाराजगी
स्थानीय निवासी धनजी तिवारी ने कहा कि कार्यपालक पदाधिकारी पूर्व में भी रामलीला के दौरान निरीक्षण कर चुकी हैं और उन्हें जानकारी है कि यहां लगातार रामलीला का मंचन हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले से लगे ताले के ऊपर दूसरा ताला लगाया गया। उन्होंने कहा कि रामलीला के आयोजन के लिए आयोजकों के पास चाबी रहती है और रात में मंचन होता है। ऐसे में तालाबंदी करने से पहले आयोजकों से बातचीत की जानी चाहिए थी।
वहीं अभिमन्यु सिंह कुशवाहा ने आरोप लगाया कि रामलीला मंच पर तालाबंदी से लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची है। उन्होंने कहा कि चौसा का रामलीला मंच स्थानीय लोगों के लिए आन-बान-शान का प्रतीक है और इस मामले में जिम्मेदार लोगों को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
ईओ ने दी सफाई- ‘सनातन विरोधी नहीं हूं, मामले को जानबूझकर तूल दिया जा रहा’
विवाद को लेकर कार्यपालक पदाधिकारी रानी कुमारी ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि वह सनातन विरोधी नहीं हैं और मामले को जानबूझकर तूल दिया जा रहा है। उनके अनुसार, जिस भवन को स्थानीय लोग रामलीला मंच के रूप में बता रहे हैं, वह वास्तव में साक्षरता भवन है और सार्वजनिक उपयोग के लिए है।
उन्होंने बताया कि भवन के बगल में स्थित सार्वजनिक शौचालय में काम कराया जाना है। बाजार में नाली निर्माण के निरीक्षण के दौरान वह भवन के अंदर जाना चाहती थीं, लेकिन चाबी उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्होंने अलग से ताला लगा दिया, ताकि संबंधित लोगों के आने पर यह पता चल सके कि भवन में पहले से ताला किसने लगाया है।
ईओ के मुताबिक, भवन के अंदर क्या सामग्री अथवा सामान रखा है, इसकी लिखित जानकारी लेने के बाद ताला खोलने की बात कही गई थी। विवाद सामने आने के बाद उन्होंने नगर पंचायत के कर्मी को ताला खोलने के लिए भेज दिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भवन आगे भी सार्वजनिक कार्यों के लिए खुला रहेगा।
प्रशासनिक प्रक्रिया और परंपरा के बीच संवाद की कमी बनी विवाद की वजह
फिलहाल चौसा का यह विवाद केवल एक ताले तक सीमित नहीं रह गया है। एक ओर नगर पंचायत की कार्यपालक पदाधिकारी इसे सार्वजनिक भवन और वहां प्रस्तावित कार्य से जुड़ा प्रशासनिक मामला बता रही हैं, वहीं स्थानीय लोग रामलीला के बीच तालाबंदी को वर्षों पुरानी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा में हस्तक्षेप मान रहे हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि सार्वजनिक भवन के उपयोग, नगर पंचायत के विकास कार्य और 102 साल पुरानी रामलीला परंपरा के बीच बेहतर तालमेल क्यों नहीं बनाया जा सका? यदि तालाबंदी से पहले नगर पंचायत प्रशासन, रामलीला समिति और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद हो जाता, तो संभवतः विवाद की स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
दुर्गापूजा के संवेदनशील माहौल के बीच उत्पन्न इस विवाद में अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन और स्थानीय लोग आपसी संवाद से मामले का समाधान निकालें, ताकि चौसा की ऐतिहासिक रामलीला परंपरा भी निर्बाध रूप से जारी रहे और सार्वजनिक भवन से जुड़े प्रशासनिक कार्य भी नियमानुसार संपन्न हो सकें।




