RELIGION

राम वन गमन और केवट प्रसंग ने किया दर्शकों को भावविभोर

किला मैदान में 20 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के 11वें दिन सुदामा चरित्र और राम वन गमन की भावपूर्ण प्रस्तुति, भक्ति-मित्रता और समर्पण का मिला संदेश

न्यूज़ विज़न।  बक्सर 
श्री रामलीला समिति, बक्सर के तत्वावधान में ऐतिहासिक किला मैदान स्थित विशाल रामलीला मंच पर आयोजित 20 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के 11वें दिन सोमवार को भक्ति और भावनाओं से ओतप्रोत विभिन्न प्रसंगों का मंचन किया गया। श्रीधाम वृंदावन से पधारे श्री बाल कृष्ण रासलीला एवं रामलीला मंडल द्वारा स्वामी श्री मोहन श्याम भारद्वाज के सफल निर्देशन में दिन में ‘सुदामा चरित्र भाग-1’ तथा देर रात्रि ‘श्रीराम वन गमन एवं केवट प्रसंग’ का प्रभावशाली मंचन किया गया।

 

राम वन गमन प्रसंग के दौरान मंत्री सुमंत श्रीराम, लक्ष्मण एवं माता सीता को रथ पर लेकर वन की ओर प्रस्थान करते हैं। शाम करीब 5 बजे रामलीला मंच से निकला श्रीराम का रथ नगर भ्रमण करते हुए स्टेशन रोड स्थित कमलदह सरोवर पहुँचा। यहां प्रसंग का मंचन करने के बाद रथ पुनः रामलीला मंच पर लौटा। इसके बाद मंचन में दिखाया गया कि वन में श्रीराम की भेंट निषादराज से होती है, जो प्रभु के स्वागत और सेवा-सत्कार में जुट जाते हैं। श्रीराम बरगद का दूध मंगाकर उससे अपनी जटाएं बनाते हैं। यह दृश्य देखकर मंत्री सुमंत भावुक हो जाते हैं और प्रभु श्रीराम से अयोध्या वापस लौटने की विनती करते हैं। हालांकि श्रीराम उन्हें धैर्य बंधाते हुए वापस अयोध्या भेज देते हैं।

 

इसके बाद नदी पार करने के लिए श्रीराम केवट से नाव मांगते हैं। केवट प्रभु के चरणों की महिमा बताते हुए पहले उनके चरण पखारने की इच्छा व्यक्त करता है। प्रभु की अनुमति मिलने के बाद केवट उनके चरण धोकर उन्हें नाव से नदी पार कराता है। केवट की भक्ति और प्रभु श्रीराम के प्रति समर्पण के इस प्रसंग ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। वहीं दिन में प्रस्तुत ‘सुदामा चरित्र भाग-1’ में श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की शुरुआत का मनोहारी प्रसंग दिखाया गया। गुरु सांदीपनि के आश्रम जाते समय दोनों की भेंट होती है। सुदामा के पैर में कांटा चुभने पर श्रीकृष्ण उनके पास पहुंचकर कांटा निकालते हैं, जिसके बाद दोनों की मित्रता और प्रगाढ़ हो जाती है।

आगे गुरुजी द्वारा पाठ भूल जाने पर श्रीकृष्ण और सुदामा को वन से लकड़ियां लाने के लिए भेजा जाता है। उनके साथ चने की पोटली भी दी जाती है। वन में भूख लगने पर सुदामा श्रीकृष्ण के हिस्से के चने भी खा जाते हैं। कथा के आगे के प्रसंग में सुदामा के जीवन में आने वाली दरिद्रता का मार्मिक चित्रण किया गया। दोनों लीलाओं के प्रभावशाली मंचन ने दर्शकों को भक्ति, मित्रता, त्याग, सेवा और समर्पण का संदेश दिया। मंचन के दौरान रामलीला मंच पर मौजूद दर्शक भाव-विभोर होकर प्रसंगों से जुड़ते नजर आए।

 

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