एचडीएफसी बैंक पर जिला उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसला, ग्राहक को ₹25 हजार क्षतिपूर्ति देने का आदेश
बिना जानकारी लोन री-शेड्यूल कर बढ़ाई गई ईएमआई, सेवा में घोर त्रुटि मानते हुए आयोग ने दो माह में भुगतान का दिया निर्देश


न्यूज़ विज़न। बक्सर
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बक्सर ने एचडीएफसी बैंक की सेवा में गंभीर त्रुटि पाते हुए परिवादी के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आयोग ने बैंक को ग्राहक को ₹25,000 क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया है। साथ ही स्पष्ट किया है कि यदि आदेश की तिथि से दो माह के भीतर राशि का भुगतान नहीं किया गया तो बैंक को 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करना होगा।
परिवादी के अधिवक्ता डॉ. विष्णुदत्त द्विवेदी ने बताया कि ब्रह्मपुर निवासी दिलीप कुमार (पिता-स्वर्गीय शंभू प्रसाद) ने होंडा एक्टिवा 5जी दोपहिया वाहन खरीदने के लिए एचडीएफसी बैंक से ₹60,839 का ऋण लिया था। ऋण समझौते के अनुसार उन्हें प्रत्येक माह ₹5,779 की ईएमआई जमा करनी थी। अधिवक्ता के अनुसार वर्ष 2021 तक परिवादी ने कुल ₹52,011 की राशि जमा कर दी थी और लगभग ₹8,000 का भुगतान शेष था। इसी दौरान उनके मोबाइल पर बैंक की ओर से एक संदेश प्राप्त हुआ, जिसमें बताया गया कि उनके ऋण खाते का पुनर्निर्धारण (री-शेड्यूल) कर दिया गया है और अब उन्हें आगामी दो वर्षों तक ₹1,457 प्रतिमाह की दर से ईएमआई जमा करनी होगी। परिवादी ने आरोप लगाया कि यह परिवर्तन उनकी जानकारी और सहमति के बिना किया गया, जिससे उन्हें मूल बकाया से कहीं अधिक, लगभग ₹20 हजार अतिरिक्त राशि का भुगतान करना पड़ता। इसे बैंक की मनमानी और सेवा में गंभीर लापरवाही बताते हुए उन्होंने वर्ष 2022 में जिला उपभोक्ता आयोग में परिवाद पत्र संख्या-03/2022 दाखिल किया।
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि बैंक की ओर से उपभोक्ता को बिना उचित जानकारी दिए ऋण खाते का पुनर्निर्धारण किया गया, जो सेवा में स्पष्ट त्रुटि (Deficiency in Service) है। न्यायाधीश वेद प्रकाश सिंह एवं सदस्य राजीव सिंह की खंडपीठ ने एचडीएफसी बैंक को परिवादी को ₹25,000 क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। आयोग ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यदि दो माह के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है तो उक्त राशि पर 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा। यह फैसला उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है और यह संदेश देता है कि किसी भी वित्तीय संस्था द्वारा ग्राहक की सहमति के बिना ऋण की शर्तों में बदलाव करना उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत चुनौती दी जा सकती है।





