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मानव शरीर पाकर इस तन की कीमत नहीं समझता वह अभागा है : कृष्णानंद शास्त्री जी

श्री रामेश्वर नाथ मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का हुआ समापन, भंडारा में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया

न्यूज विजन। बक्सर

सर्वजन कल्याण सेवा समिति सिद्धाश्रम धाम बक्सर की ओर से श्री रामेश्वर नाथ मंदिर परिसर में आयोजित 18 वां धर्म आयोजन कथा, हवन, पूजन और भव्य भंडारा के साथ संपन्न हो गया। वहीं 18वें धार्मिक आयोजन के अंतर्गत श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के आठवें दिन न केवल ज्ञान की पराकाष्ठा दिखी, बल्कि समिति का 18 पुराणों की कथा आयोजित करने का ऐतिहासिक संकल्प भी विधिपूर्ण हो गया। प्रात: 6 बजे से मंडप पूजन, हवन तथा पूर्णाहुति के बाद ब्राह्मण भोज, देव विसर्जन एवं विदाई का कार्य संपन्न हुआ।

 

 

आज की अत्यंत करुणामयी कथा का श्रवण कर श्रोताओं का हृदय भर आया। कथा ब्यास आचार्य श्री कृष्णानंद शास्त्री पौराणिक जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर जीव को तब मिलता है जब श्री हरि बिना कारण कृपा करते हैं। जो मानव शरीर पाकर इस तन की कीमत नहीं समझता वह अभागा मनुष्य पूरे 84 लाख योनियों में भटकता हुआ दुख भोगता रहता है। लेकिन, जो मनुष्य इस राज को समझ कर संभल जाता है तथा श्री हरि के चरण का आश्रय प्राप्त कर लेता है वह अनायास ही भव भय से मुक्त हो जाता है।

 

 

महाराज परीक्षित चरित्र का आचार्य श्री ने विस्तार से वर्णन किया। महाराज परीक्षित को भगवान की महिमा का गायन करते हुए श्री सुखदेव जी ने कहा राजन आप धन्य है। आपने अपना सर्वश्रेष्ठ त्याग कर समस्त संसार के कल्याणकारी गंगा तट का आश्रय लेकर श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा का श्रवण किया है। आज सातवां दिन है ब्राह्मण के द्वारा निकली ब्रह्म वाणी कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकती। अतः तक्षक अर्थात मृत्यु अवश्य आएगी किंतु हे राजन आत्मा सदैव अजर अमर है तथा शरीर समान मृत्यु सर्वदा शरीर का ही होती है अर्थात आत्मा का नहीं। इसलिए यह भागवत कथा आपकी आत्मा को परमात्मा तक पहुंचाएगी। ब्राह्मण का अभिशाप आपके नश्वर शरीर को तक्षक सर्प के डस कर भस्म करेगा। हे नर श्रेष्ठ शरीर प्रति क्षण मरता रहता है किंतु आत्मा अजर एवं अमर होने के कारण मरणधर्मी नहीं है। हे भूपति काल ही तक्षक है और मनुष्य परीक्षित है। 7 दिन ही मरने की अवधि है। इन्हीं 7 दिनों में सभी की मृत्यु होती है।

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति का कर्म ही ब्राह्मण का अभिशाप है। कर्म के द्वारा प्रेषित काल रूपी तक्षक सर्प सभी मनुष्यों को इन्हीं सातों दिनों में डसता है। जो मनुष्य अज्ञानी है वह तो मरते हैं किंतु जो भागवत का ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह जानता है की मृत्यु शरीर की ही होती है जीव की नहीं। वह श्री हरि के धाम में निवास करता है।

 

 

सुखदेव जी ने महाराज परीक्षित से कहा कि अंतिम उपदेश दे रहा हूं। तुम अपने मन को समस्त इंद्रियों के साथ श्री हरि के चरणों में लगाओ। तुम्हारी आत्मा परमात्मा से मिलेगी और कालसर्प का मिलन तुम्हारे शरीर से होगा। तुम मोक्ष प्राप्त करोगे और तुम्हारा शरीर भी पांच तत्वों में विलीन हो जाएगा। आचार्य श्री पौराणिक जी ने कहा कि ऐसा कहकर श्री सुखदेव जी अपने आश्रम में चले गए। परीक्षित जी ध्यान द्वारा श्री हरि से मिल गए शरीर को तक्षक डसा और शरीर भस्म हो गया। आज भागवत जैसा प्रामाणिक ग्रंथ सृष्टि में केवल भागवत ही हैं जो डंके की चोट पर सातवें दिन मुक्ति प्रदान करता है। जब तक सृष्टि रहेगी यह भागवत मानव समाज को मोक्ष प्रदान करता रहेगा। कथा के अंतिम दिन भव्य भंडारा में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।

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