CRIME

15 साल पूर्व अधिवक्ता पर हमला करने वाले दो दोषियों को 8-8 साल की सजा

बक्सर की अदालत का अहम निर्णय, हत्या के प्रयास सहित विभिन्न धाराओं में दोषसिद्धि; ₹50-50 हजार जुर्माना भी लगाया गया

न्यूज़ विज़न।  बक्सर 
बक्सर के चर्चित अधिवक्ता प्रदुमन चौबे पर हुए जानलेवा हमले के करीब 15 वर्ष पुराने मामले में गुरुवार को जिला अपर सत्र न्यायाधीश-2 की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने मामले में दोषी पाए गए वीरेंद्र कुमार चौबे एवं हरेंद्र कुमार चौबे को हत्या के प्रयास (धारा 307) सहित विभिन्न धाराओं में दोषसिद्ध करते हुए 8-8 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। इसके साथ ही प्रत्येक दोषी पर 50-50 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया। जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

 

अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 324 के तहत दोनों दोषियों को दो-दो वर्ष के सश्रम कारावास एवं 10-10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा भी सुनाई। वहीं धारा 323 के तहत छह-छह माह के कारावास की सजा दी गई। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सभी सजाएं एक साथ (समवर्ती रूप से) चलेंगी। अपर लोक अभियोजक बिनोद कुमार सिंह ने बताया कि यह मामला औद्योगिक थाना कांड संख्या 21/12 से संबंधित है। घटना 6 जून 2011 की है। उस दिन अहिरौली निवासी अधिवक्ता प्रदुमन चौबे न्यायालय गए हुए थे। इसी दौरान उनके घर से फोन कर सूचना दी गई कि उनके गोतिया उन पर जानलेवा हमला करने की फिराक में हैं। इसके बाद उन्होंने इस आशंका की जानकारी अधिवक्ता संघ को भी दी।

 

कोर्ट से वापस घर लौटने के दौरान सारीमपुर बगीचा के समीप पहले से घात लगाए बैठे आरोपितों ने उन्हें घेर लिया। आरोप है कि लाठी, भाला, रॉड (रामी) और कट्टा से हमला कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया। घटना के दौरान आसपास के लोग मौके पर पहुंचे, जिसके बाद हमलावर वहां से फरार हो गए। घायल अधिवक्ता को तत्काल सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उन्होंने पुलिस के समक्ष अपना फर्द बयान दर्ज कराया था। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहों की गवाही तथा अनुसंधान को महत्वपूर्ण माना। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने दोनों आरोपितों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।इस फैसले को लंबे समय से लंबित चल रहे इस आपराधिक मामले में न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। करीब डेढ़ दशक बाद आए इस निर्णय से पीड़ित पक्ष को न्याय मिला है, वहीं गंभीर आपराधिक मामलों में साक्ष्य और गवाहों के महत्व को भी अदालत के फैसले ने रेखांकित किया है।

 

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