OTHERS

बक्सर के अहिरौली से जेएनयू तक: प्रो. देवेंद्र चौबे की कृति ‘1764 तथा अन्य कहानियाँ’ ने इतिहास, लोकस्मृति और साहित्य के रिश्ते पर छेड़ी गंभीर बहस

बक्सर युद्ध के 262 वर्ष के संदर्भ में जेएनयू में ‘स्मृति, इतिहास और साहित्य’ पर परिसंवाद; प्रो. देवेंद्र चौबे और किरण सिंह की पुस्तकों का लोकार्पण, विद्वानों ने इतिहास के साथ लोकस्मृतियों और मौखिक परंपराओं की भूमिका पर किया विमर्श

न्यूज़ विज़न।  नई दिल्ली /बक्सर
1764 का बक्सर युद्ध भारतीय इतिहास की उन निर्णायक ऐतिहासिक घटनाओं में शामिल है, जिसने न केवल तत्कालीन राजनीतिक सत्ता-संतुलन को प्रभावित किया, बल्कि भारत में औपनिवेशिक सत्ता के विस्तार की दिशा भी निर्धारित की। बक्सर युद्ध के 262 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इस ऐतिहासिक घटना को साहित्य, लोकस्मृति और समकालीन इतिहास-बोध के संदर्भ में देखने की एक महत्वपूर्ण पहल नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में हुई।

 

जेएनयू के भाषा संस्थान के समिति कक्ष में विश्वविद्यालय के अध्येताओं के ‘हमारे समय का साहित्य’ समूह की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बक्सर के अहिरौली निवासी एवं जेएनयू के प्रोफेसर देवेंद्र चौबे की पुस्तक ‘1764 तथा अन्य कहानियाँ’ तथा किरण सिंह की कृति ‘महुआ डावर’ का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम का केंद्रीय विषय ‘1764 : बक्सर-युद्ध के 262 वर्ष’ के संदर्भ में स्मृति, इतिहास और साहित्य रहा।

 

कार्यक्रम में इतिहासकार सलिल मिश्र ने इतिहास और साहित्य के पारंपरिक विभाजन पर गंभीरता से विचार रखते हुए कहा कि उन्नीसवीं सदी में इतिहास को दस्तावेजों पर आधारित और साहित्य को कल्पना पर आधारित दो अलग-अलग अनुशासन माना जाता था। लेकिन बीसवीं सदी में मानवशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञानों के विकास के साथ इस विभाजन को चुनौती मिली। यह समझ विकसित हुई कि जिन समुदायों के पास लिखित इतिहास नहीं है, उनकी संस्कृति, जीवन-पद्धति, मौखिक परंपराएं और सामूहिक स्मृतियां भी अतीत को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

सलिल मिश्र ने दोनों लेखकों को उनकी कृतियों के लिए बधाई देते हुए कहा कि 1764 और 1857 भारतीय इतिहास के निर्णायक संघर्ष रहे हैं। उन्होंने वर्तमान समय की स्मृति संबंधी चुनौती की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया। उनके अनुसार आज समस्या केवल स्मृतियों के लोप की नहीं है, बल्कि समाज स्मृतियों के अत्यधिक बोझ से भी दबता जा रहा है। उन्होंने वर्तमान दौर को ‘प्रोग्राम्ड मेमोरीज़’ का दौर बताते हुए कहा कि सामूहिक स्मृतियों की स्वायत्तता लगातार प्रभावित हो रही है।

परिसंवाद में इतिहासलेखन, लोकस्मृति, औपनिवेशिक सत्ता, विस्थापन और समकालीन समाज से जुड़े अनेक प्रश्नों पर गंभीर चर्चा हुई। आलोचक विनोद शाही ने महुआ डावर को हिंदी की व्यापक औपन्यासिक परंपरा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने साहित्य के माध्यम से स्वराज और लोकचेतना की खोज के प्रश्न को भी सामने रखा।

कार्यक्रम में सर्जनात्मक अनुवाद की जटिलताओं पर भी विशेष चर्चा हुई। स्पेनिश के विद्वान राजीव सक्सेना, अरबी के मुजीबुर रहमान, उर्दू की सफीना बेगम, विज्ञान के अध्येता डी.पी. वाजपेयी तथा रूसी की सोनू सैनी ने कहा कि किसी साहित्यिक कृति का अनुवाद केवल शब्दों को एक भाषा से दूसरी भाषा में स्थानांतरित करना नहीं है। पाठ में मौजूद स्थानीय संदर्भों, सांस्कृतिक संकेतों तथा ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से निर्मित भाव और मनःस्थितियों का अनुवाद करना एक जटिल रचनात्मक प्रक्रिया है। उन्होंने इसे अनुवादकों के लिए बड़ी चुनौती बताया।

स्थानीय स्मृतियों और मौखिक इतिहास पर देवेंद्र चौबे का जोर

लेखकीय वक्तव्य में प्रोफेसर देवेंद्र चौबे ने स्थानीय स्मृतियों के महत्व को रेखांकित किया। बक्सर के अहिरौली जैसे स्थानीय भूगोल से जुड़े अनुभवों और स्मृतियों को व्यापक इतिहास-बोध से जोड़ते हुए उन्होंने लोक में मौजूद मौखिक कथाओं को इतिहास की समझ विकसित करने में महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखने की आवश्यकता पर बल दिया। प्रो. चौबे की पुस्तक ‘1764 तथा अन्य कहानियाँ’ का बक्सर युद्ध के 262वें वर्ष के संदर्भ में लोकार्पण विशेष महत्व रखता है। बक्सर की धरती पर लड़े गए 1764 के युद्ध को केवल एक सैन्य संघर्ष या राजनीतिक घटना के रूप में देखने के बजाय उससे जुड़ी स्मृतियों, स्थानीय अनुभवों और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों को साहित्यिक संवेदना के माध्यम से देखने की कोशिश इस कृति को स्थानीय इतिहास और साहित्य के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में सामने लाती है। वहीं उपन्यासकार किरण सिंह ने अपने लेखकीय वक्तव्य में स्थानीय स्मृतियों के महत्व को रेखांकित किया और ऐतिहासिक विस्मृति के विरुद्ध रचनाकार की जिम्मेदारी पर जोर दिया।

इतिहासकार प्रो. एस.एम.आर. रिजवी ने बताया 1764 और 1857 का ऐतिहासिक महत्व

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे इतिहासकार प्रो. एस.एम.आर. रिजवी ने 1857 से जुड़े महुआ डाबर तथा 1764 के ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने ग्रामीण समाज द्वारा अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध किए गए प्रतिरोध को महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिघटना बताते हुए कहा कि लोकजीवन में मौजूद प्रतिरोध की स्मृतियां इतिहास की व्यापक समझ को समृद्ध करती हैं। उन्होंने इतिहास और साहित्य की भूमिकाओं के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि इतिहासकार का मूल दायित्व अतीत की घटनाओं की वास्तविकता और स्रोतों की विश्वसनीयता की जांच करना है, जबकि साहित्यकार वर्तमान अनुभवों के आधार पर भविष्य के समाज की कल्पना भी करता है। दोनों की पद्धतियां अलग हैं, लेकिन समाज को समझने में दोनों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है।

इतिहास-बोध के बिना लेखन अधूरा : देश निर्मोही

कार्यक्रम में आधार प्रकाशन के निदेशक एवं पल प्रतिपल के संपादक देश निर्मोही ने कहा कि इतिहास-बोध के बिना कोई भी लेखन अधूरा होता है। उन्होंने साहित्य और इतिहास के बीच निरंतर संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम का संचालन युवा अध्येता अभिषेक पाण्डेय ने किया। गनेशी लाल ने 1857 की ‘सुंदर वेश्या’ का एक गीत प्रस्तुत करते हुए अतिथियों का स्वागत किया। रंगकर्मी राजेश कुमार तिवारी ने दोनों लोकार्पित कृतियों से एक-एक अंश का पाठ किया। धीरेश तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए साहित्य और इतिहास के बीच आवाजाही को महत्वपूर्ण बताया। परिसंवाद में इतिहासकार राज गोपाल सिंह वर्मा, रश्मि चौधरी, कथाकार गरिमा श्रीवास्तव, हरियश राय, पत्रकार रविन्द्र त्रिपाठी, भाषाविद रजनीश कुमार मिश्र, सुशांत कुमार मिश्र, आलोचक अजमेर सिंह काजल, वंदना झा, राजेश कुमार पासवान, देवीलाल सहित जेएनयू के बड़ी संख्या में अध्येता और साहित्य-इतिहास से जुड़े विद्वान उपस्थित रहे।

बक्सर की ऐतिहासिक स्मृति को राष्ट्रीय अकादमिक विमर्श से जोड़ती कृति

इस परिसंवाद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि इतिहास, साहित्य और स्मृति को अलग-अलग विषयों के रूप में देखने के बजाय उनके पारस्परिक संबंधों पर गंभीर विचार किया गया। विनोद शाही ने साहित्य के माध्यम से स्वराज और लोकचेतना की खोज का प्रश्न उठाया, सलिल मिश्र ने स्मृतियों के निर्माण और उनके नियंत्रण की समकालीन समस्या सामने रखी, किरण सिंह ने ऐतिहासिक विस्मृति के विरुद्ध रचनाकार की जिम्मेदारी पर जोर दिया और देवेंद्र चौबे ने स्थानीय स्मृतियों तथा साहित्यिक कल्पना के संबंधों को रेखांकित किया। वहीं प्रो. एस.एम.आर. रिजवी ने ऐतिहासिक साक्ष्यों की प्रामाणिकता के साथ-साथ सामान्य जनता की ऐतिहासिक भूमिका की ओर ध्यान आकर्षित किया।

विशेष रूप से बक्सर के लिए यह आयोजन इसलिए महत्वपूर्ण है कि बक्सर के अहिरौली निवासी प्रोफेसर देवेंद्र चौबे, जो जेएनयू जैसे देश के प्रमुख विश्वविद्यालय में अध्यापन एवं अकादमिक विमर्श से जुड़े हैं, ने अपनी कृति ‘1764 तथा अन्य कहानियाँ’ के माध्यम से बक्सर की ऐतिहासिक स्मृति को व्यापक साहित्यिक और बौद्धिक विमर्श से जोड़ने का प्रयास किया है। बक्सर युद्ध के 262 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इस पुस्तक का लोकार्पण केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि बक्सर की ऐतिहासिक विरासत, स्थानीय स्मृतियों और राष्ट्रीय इतिहास-बोध के बीच संवाद स्थापित करने की दृष्टि से भी उल्लेखनीय माना जा सकता है।

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button