स्पेशल स्टोरी : बक्सर के इतिहास की सबसे बड़ी मुठभेड़: 25 जून 2010 की वह सुबह, जब 22 घंटे की जंग के बाद खत्म हुआ सुरेश राजभर का साम्राज्य
22 घंटे तक गोलियों की गूंज, एक जवान की शहादत, सात कुख्यात अपराधियों का अंत और आतंक के युग का समापन। 16 साल बाद भी लक्ष्मणपुर डेरा की वीरानी उस मुठभेड़ की गवाही देती है


न्यूज़ विज़न। राजपुर/बक्सर, पंकज कमल / अलोक कुमार
बक्सर जिले के इतिहास में 25 जून 2010 की तारीख हमेशा एक निर्णायक दिन के रूप में याद की जाएगी। यह वह सुबह थी, जब करीब 22 घंटे तक चली भीषण पुलिस मुठभेड़ के बाद कुख्यात बागी मोर्चा प्रमुख सुरेश राजभर और उसके छह साथियों का अंत हुआ। जिले के अपराध इतिहास में यह अब तक की सबसे बड़ी पुलिस कार्रवाई मानी जाती है, जिसमें एक साथ सात अपराधी मारे गए। इससे पहले और इसके बाद बक्सर में इस स्तर का कोई पुलिस एनकाउंटर नहीं हुआ। राजपुर थाना क्षेत्र की बारूपुर पंचायत का लक्ष्मणपुर डेरा उस समय सुरेश राजभर का सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाता था। राजभर बहुल आबादी वाला यह इलाका उसके प्रभाव के कारण लोगों में भय का पर्याय बन चुका था। हालत यह थी कि आम लोग इस गांव से गुजरने तक से डरते थे।

24 जून 2010: जब शुरू हुआ ऑपरेशन
24 जून 2010 की दोपहर गुप्त सूचना के आधार पर तत्कालीन राजपुर थानाध्यक्ष रघुनाथ सिंह पुलिस बल के साथ गांव पहुंचे और पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी। खुद को घिरा देख सुरेश राजभर ने एक खपरैलनुमा मकान से पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी। इस गोलीबारी में बिहार सैप के जवान अवधेश साह शहीद हो गए। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे तत्कालीन पुलिस अधीक्षक उपेन्द्र कुमार सिन्हा ने राज्य पुलिस मुख्यालय को सूचना दी। मौके पर शाम होते होते शहाबाद डीआईजी सुनील एम खोपड़े पहुंच गए और कुछ ही घंटों में बिहार और उत्तर प्रदेश के कई थानों की पुलिस ने गांव को चारों ओर से घेर लिया। पूरी रात रुक-रुक कर गोलीबारी होती रही। अंधेरा और कठिन परिस्थितियों के बावजूद पुलिसकर्मियों ने वाहनों की हेडलाइट के सहारे मोर्चा संभाले रखा।

25 जून की सुबह: आतंक का अंत
करीब 22 घंटे तक चली मुठभेड़ के बाद 25 जून की सुबह सुरेश राजभर और उसके साथियों ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन पुलिस कार्रवाई में सुरेश राजभर समेत सात अपराधी मारे गए। सभी शवों को पहचान के लिए बक्सर सदर अस्पताल लाया गया, लेकिन उन्हें लेने कोई परिजन नहीं पहुंचा। इस कार्रवाई के साथ बक्सर के एक लंबे और खूनी अपराध अध्याय का अंत हुआ। इसके बाद इलाके में सड़क, शिक्षा और सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ी तथा धीरे-धीरे सामान्य जीवन लौटने लगा।

16 साल बाद भी वीरान है लक्ष्मणपुर डेरा
हालांकि मुठभेड़ के 16 वर्ष बाद भी करीब 100 की आबादी वाला लक्ष्मणपुर डेरा आज भी काफी हद तक सुनसान और वीरान दिखाई देता है। गांव की भौगोलिक स्थिति और वर्षों तक रहे भय का असर आज भी यहां महसूस किया जा सकता है।
छह साल बाद फिर खून से रंगा गांव मुठभेड़ के बाद कुछ वर्षों तक शांति रही, लेकिन 13 अप्रैल 2016 की रात सुरेश राजभर के भाई मुन्ना राजभर ने कथित प्रतिशोध में रामबचन राजभर, संतोष राजभर और मनोज राजभर की हत्या कर दी। इसके बाद 21 फरवरी 2018 को उसी परिवार के अवधबिहारी राजभर की भी हत्या कर दी गई। ग्रामीणों के अनुसार, सुरेश राजभर की मां ने कभी कहा था कि “सात के बदले सात की हत्या होगी।” इसी प्रतिशोध की कड़ी में एक ही परिवार के चार लोगों की जान चली गई। भय के कारण परिवार के अधिकांश पुरुष गांव छोड़ चुके हैं और घर की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर है।

कैसे अपराध की राह पर चला सुरेश राजभर
बताया जाता है कि सुरेश राजभर मूल रूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला था और अपने ननिहाल ईटवा में रहकर मंगराव मध्य विद्यालय में पढ़ाई करता था। बचपन में वह पढ़ाई के साथ गीत भी गाता था। ग्रामीणों के अनुसार, उसके मामा की हत्या के बाद उसके मन में बदले की भावना पैदा हुई। इसी दौरान उसकी मुलाकात कुख्यात दस्यु छवांगुर पासवान से हुई और वह अपराध की दुनिया में उतर गया। समय के साथ दोनों की जोड़ी ने पूरे शाहाबाद क्षेत्र में आतंक का नेटवर्क खड़ा कर दिया। बाद में छवांगुर पासवान भी पुलिस मुठभेड़ में मारा गया, जबकि 25 जून 2010 को सुरेश राजभर का भी अंत हो गया।

बक्सर के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा यह दिन
25 जून 2010 केवल एक पुलिस मुठभेड़ की तारीख नहीं, बल्कि बक्सर के अपराध इतिहास का वह मोड़ है जिसने पूरे इलाके की दिशा बदल दी। एक ओर पुलिस ने अपने एक बहादुर जवान को खोया, तो दूसरी ओर सात कुख्यात अपराधियों के अंत के साथ वर्षों से कायम आतंक का अध्याय भी समाप्त हुआ। आज, 16 वर्ष बाद भी यह घटना बक्सर के लोगों की स्मृतियों में उसी तरह जीवित है और जिले के इतिहास में इसे सबसे बड़ी पुलिस कार्रवाई के रूप में याद किया जाता है।





