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दिल्ली में गूंजा बक्सर का बौद्धिक स्वर, ‘इतिहास की कोई सरहद नहीं होती’ पर मंथन

1857 मई क्रांति दिवस पर आयोजित तीसरे क्रिएटिव हिस्ट्री वार्षिक व्याख्यान में इतिहास, समाज और संस्कृति के नए आयामों पर हुई चर्चा

न्यूज़ विज़न।  बक्सर 
नई दिल्ली स्थित सेक्युलर हाउस के सभागार में 10 मई 2026 को 1857 मई क्रांति दिवस के अवसर पर आयोजित तीसरे क्रिएटिव हिस्ट्री वार्षिक व्याख्यान 2026 में इतिहास, समाज और संस्कृति के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श हुआ। कार्यक्रम का आयोजन क्रिएटिव हिस्ट्री ट्रस्ट द्वारा समाजवादी शिक्षा संस्थान, रंगश्री, परम्परा/जेएनयू स्कॉलर ग्रुप तथा बक्सर स्कूल ऑफ हिस्ट्री के संयुक्त सौजन्य से किया गया। दिल्ली में आयोजित इस बौद्धिक आयोजन में बक्सर की सांस्कृतिक और वैचारिक भागीदारी विशेष रूप से चर्चा का केंद्र रही।

 

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पत्रकार-इतिहासकार विवेक शुक्ल ने कहा कि “इतिहास की कोई सरहद नहीं होती। नया इतिहास हमेशा सरहदों के बाहर ही बनता है। जब-जब इतिहास रूढ़ हुआ है, तब-तब नई विचारधाराओं, सामूहिक आंदोलनों और नई पद्धतियों ने उसे जकड़न से मुक्त किया है।” उन्होंने दिल्ली के स्थापत्य, सांस्कृतिक और सामाजिक इतिहास की बारीकियों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कनॉट प्लेस, दरियागंज, पुरानी किताबों की दुकानों, पुलों, सड़कों और विभाजन के दौर के सामाजिक बदलावों का उल्लेख किया। विवेक शुक्ल ने कहा कि किसी भी समाज या राष्ट्र का इतिहास केवल बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों से नहीं बनता, बल्कि छोटे-छोटे सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ भी इतिहास के निर्माण में समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।

 

‘इतिहास की सरहदें’ विषय पर हुआ परिसंवाद
कार्यक्रम में आयोजित “इतिहास की सरहदें” विषयक परिसंवाद में इतिहासकार सलिल मिश्र, रश्मि चौधरी, राजनीतिक समाजशास्त्री मणीन्द्र नाथ ठाकुर तथा लेखक अख़लाक अहमद आहन ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि इतिहास को केवल शासकों या सत्ता के दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता, बल्कि जनता, जनसमूह और समाज की स्मृतियां भी इतिहास की दिशा तय करती हैं। वक्ताओं ने कहा कि इतिहास कोई स्थिर अवधारणा नहीं है, बल्कि वह प्रतिदिन बनता और बदलता रहता है। हालांकि उसकी वास्तविक रेखाएं समय के साथ स्पष्ट होती हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ इतिहासकार एस.एन.आर. रिज़वी ने कहा कि “विषय और विचार ही चीजों की सीमाएं तय करते हैं।” उन्होंने इतिहास के बहुलतावादी स्वरूप को समझने पर जोर दिया।

पुस्तकों का लोकार्पण और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां बनी आकर्षण का केंद्र
उद्घाटन सत्र में इतिहासकार एस.एन.आर. रिज़वी की पुस्तक “एक इतिहासकार की आत्मकथा”, रश्मि चौधरी एवं देवेंद्र चौबे की पुस्तक “इतिहास की सरहदें” तथा सोनिका भारती की पुस्तक “डिअर इडियट, दिस इज लाइफ” का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत अभिषेक पाण्डेय द्वारा 1857 की क्रांति पर आधारित आदिवासी लोकगीत की प्रस्तुति से हुई, जिसने पूरे सभागार को ऐतिहासिक चेतना से भर दिया। वहीं समापन सत्र में धीरेश तिवारी ने 1857 के महानायक वीर कुंवर सिंह पर आधारित नाटक “सुराज” के अंशों का प्रभावशाली एकल मंचन प्रस्तुत किया।

बक्सर के बौद्धिक सरोकारों की दिल्ली में दिखी मजबूत उपस्थिति
इतिहास केंद्रित इस व्याख्यान और परिसंवाद का संचालन युवा आलोचक अजय कुमार यादव ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन युवा अध्येता आशीष कुमार पाण्डेय ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य, इतिहास और सामाजिक अध्ययन से जुड़े अध्येताओं एवं बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। इनमें अनिल कुमार सिंह, वेद प्रकाश सोनी, अदिति शरण, प्रदीप कुमार, सुदर्शन लाल, सुशील कुमार, अशोक यादव, बृजभूषण चौबे, संजय कुमार, मीरा कुमारी, डॉ. उज़्मा और देवेंद्र चौबे समेत कई प्रमुख नाम शामिल रहे। दिल्ली में आयोजित इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि बक्सर जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र की बौद्धिक चेतना अब राष्ट्रीय विमर्श में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है।

 

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