“एक्सप्रेसवे का वादा, ‘एक्सीडेंटवे’ की हकीकत: 18 KM की सड़क ने खोल दी सिस्टम की पोल”
बक्सर से डुमरांव तक बदहाल सड़क बनी जानलेवा, घंटों का सफर, रोज हादसे—फिर भी खामोश प्रशासन और जिम्मेदार जनप्रतिनिधि, विकास का दावा या जमीनी धोखा?


न्यूज़ विज़न। बक्सर
जिले में विकास की असली तस्वीर अब किसी रिपोर्ट या भाषण में नहीं, बल्कि उस 18 किलोमीटर लंबी जर्जर सड़क पर साफ दिखाई दे रही है, जो जिला मुख्यालय को डुमरांव अनुमंडल से जोड़ती है। चुनाव के दौरान जिस सड़क को “एक्सप्रेसवे” बनाने के दावे किए गए थे, आज वही सड़क “एक्सीडेंटवे” बनकर लोगों की जान पर भारी पड़ रही है।
गड्ढों में दबी सड़क, खतरे में जिंदगी
सड़क पर जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे हैं, जो हर वक्त हादसे को न्योता देते नजर आते हैं। हालत इतनी खराब है कि 18 किलोमीटर की दूरी तय करने में लोगों को घंटों लग जाते हैं। एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंच पाती, मरीज रास्ते में दम तोड़ रहे हैं, स्कूली बच्चे रोज जोखिम उठाकर सफर कर रहे हैं, किसानों की उपज बाजार पहुंचने से पहले खराब हो जाती है, यह सड़क अब सुविधा नहीं, बल्कि रोज का संकट बन चुकी है।
जिम्मेदारों की चुप्पी, बहानों की भरमार
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इतनी गंभीर समस्या के बावजूद प्रशासन और जनप्रतिनिधि पूरी तरह खामोश हैं। जब सवाल उठते हैं, तो जवाब देने के बजाय विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने लगते हैं।
ऐसा लगता है जैसे सड़क नहीं, बल्कि फाइलों का खेल चल रहा हो—जहां जनता की परेशानी का कोई महत्व नहीं।
निर्माण में गड़बड़ी के आरोप
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सड़क निर्माण में भारी अनियमितता हुई है। कुछ ही वर्षों में सड़क का इस तरह टूट जाना साफ दर्शाता है कि गुणवत्ता से समझौता किया गया। नदांव पंचायत के अंकित द्विवेदी ने तंज कसते हुए कहा कि शहर में 3 किलोमीटर सड़क पर 42 करोड़ खर्च होते हैं, जबकि गांव में 18 किलोमीटर सड़क महज 3 करोड़ में बना दी जाती है। बिना ‘मिशन कमीशन’ के कोई काम नहीं होता।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल
नदांव के वार्ड सदस्य मंटू कुमार “बबुआ जी” ने इस पूरे मामले को या तो अनुभवहीनता या इच्छाशक्ति की कमी बताया। उनका कहना है कि जिस सड़क के मुद्दे ने दो विधायकों का राजनीतिक भविष्य तय किया, उसी सड़क पर आज तक ठोस कार्रवाई नहीं होना वर्तमान नेतृत्व पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
आस्था और अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित
यह सड़क सिर्फ यातायात का जरिया नहीं, बल्कि इलाके की जीवनरेखा है। पंचकोसी परिक्रमा के दौरान हजारों श्रद्धालु इसी रास्ते से गुजरते हैं, रोजगार और शिक्षा के लिए रोजाना आने-जाने वाले युवाओं के लिए यह बड़ी समस्या बन चुकी है, अब यह मार्ग आस्था और विकास दोनों के लिए बाधा बन गया है।
बड़ा सवाल: कब जागेगा सिस्टम?
आज हालात यह हैं कि सड़क गड्ढों में दबी है और सिस्टम बहानों में उलझा हुआ है। जनता रोज गिर रही है, लेकिन सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसरा है। सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या “बड़का साहब” नींद से जागेंगे, या बक्सर की जनता यूं ही गड्ढों में गिरती रहेगी?





