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करोड़ का रेलवे ओवरब्रिज बना बक्सर के बच्चों की सजा! भ्रष्टाचार की कीमत चुका रहे मासूम छात्र, पहले ही दिन घंटों जाम में फंसी स्कूल बसें

गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुलते ही शहर की यातायात व्यवस्था ध्वस्त, सुबह 5 बजे घर से निकले कई बच्चे 8 बजे तक भी नहीं पहुंच सके स्कूल; जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों पर उठे गंभीर सवाल

न्यूज़ विज़न।  बक्सर 
गर्मी की छुट्टियों के बाद सोमवार को जिले के स्कूल खुलते ही शहर की बदहाल यातायात व्यवस्था का सबसे बड़ा खामियाजा मासूम स्कूली बच्चों को भुगतना पड़ा। स्कूल खुलने के पहले ही दिन पांडे पट्टी गुमटी से इटाढ़ी रोड तक कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया, जिसमें दर्जनों स्कूल बसें, निजी वाहन और सैकड़ों छात्र-छात्राएं घंटों तक फंसे रहे। हालात इतने खराब थे कि कई बच्चे सुबह करीब पांच बजे घर से निकलने के बावजूद सुबह आठ बजे तक भी अपने स्कूल नहीं पहुंच सके।

 

शहर की इस बदहाल व्यवस्था की सबसे बड़ी वजह दानापुर-मुगलसराय रेलवे लाइन पर स्थित पूर्वी रेलवे गुमटी का बंद होना और करोड़ों रुपये की लागत से बनाए गए नए ओवरब्रिज का उद्घाटन से पहले ही क्षतिग्रस्त हो जाना माना जा रहा है। इसके चलते पूरे शहर का यातायात सीमित वैकल्पिक मार्गों पर आ गया है, जिससे रोजाना भीषण जाम की स्थिति बन रही है। रेलवे लाइन के दक्षिणी हिस्से में स्थित डीएवी पब्लिक स्कूल, माउंट लिटेरा ज़ी स्कूल, बिरला ओपन माइंड्स, फाउंडेशन स्कूल सहित कई बड़े विद्यालयों में पढ़ने वाले हजारों छात्रों को प्रतिदिन इसी मार्ग से गुजरना पड़ता है। वहीं शहर के स्कूलों में पढ़ने वाले दक्षिणी क्षेत्र के छात्र भी इसी जाम से होकर स्कूल पहुंचते हैं। सोमवार को स्कूल खुलने के साथ ही यह समस्या विकराल रूप में सामने आई।

 

अभिभावकों का कहना है कि बच्चों का अधिकांश समय सड़क पर ही बीत रहा है। घंटों जाम में फंसे रहने से छोटे बच्चों को गर्मी, भूख और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है। कई छात्र समय पर परीक्षा और कक्षाओं में भी शामिल नहीं हो सके। यदि जल्द वैकल्पिक यातायात व्यवस्था नहीं बनाई गई तो आने वाले लगभग तीन महीनों तक हजारों परिवार इसी परेशानी से जूझते रहेंगे। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल 26 करोड़ रुपये की लागत से बने उस ओवरब्रिज पर उठ रहा है, जो उद्घाटन से पहले ही क्षतिग्रस्त हो गया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि निर्माण कार्य गुणवत्तापूर्ण होता तो आज हजारों स्कूली बच्चों को इस तरह सड़क पर घंटों नहीं भटकना पड़ता।

विपक्षी दलों सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने भी निर्माण कार्य में भारी अनियमितता, भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि जिस पुल पर जनता की सुविधा का सपना दिखाया गया था, वही पुल आज शहर की सबसे बड़ी परेशानी बन गया है। नेताओं का आरोप है कि निर्माण एजेंसियों, संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय किए बिना इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। अब सवाल यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आखिर जिम्मेदार कौन है? यदि समय रहते प्रशासन ने प्रभावी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन मासूम बच्चों को उठाना पड़ेगा, जिनका शिक्षा का अधिकार रोजाना सड़क के जाम में दम तोड़ता नजर आ रहा है।

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