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हिंदी की उपेक्षा करना भारतीय संविधान का अपमान है: आरपी वर्मा

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर वरीय अधिवक्ता सह साहित्यकार रामेश्वर प्रसाद वर्मा ने व्यक्त किये विचार

न्यूज विजन। बक्सर
हर साल 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। यह तिथि व्यक्त करती है कि मानव जीवन में मातृभाषा की अपनी एक अहम भूमिका है। अपनी मातृभाषा के माध्यम से ही व्यक्ति अपने विचारों का आदान-प्रदान करता है। यह तथ्य भी अपने आप में ऐतिहासिक है कि 14 सितंबर 1949 को हिंदी भारतीय संघ की राजभाषा घोषित हुई थी। भारत के संविधान के अनुच्छेद 351 के तहत हिंदी भाषा के प्रसार में वृद्धि करना एवं उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना केंद्रीय सरकार का कर्तव्य है। उक्त बातें अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर वरीय अधिवक्ता सह साहित्यकार रामेश्वर प्रसाद वर्मा ने कही।

 

उन्होंने बताया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार भारतीय संघ की राज भाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है। बावजूद इसके अंतराष्ट्रीय स्वरूप व समृद्धि प्राप्त करने वाली हिंदी भाषा आज अपने ही देश में उपेक्षित है। श्री वर्मा ने कहा कि भारतीय संविधान के 8वीं अनुसूची में भारत की विभिन्न 22 भाषाओं में असमी, गुजराती, तेलगू, कोंकणी, मणिपुरी, ओड़िया, संथाली, हिंदी, बांगला, मैथली, मराठी, पंजाबी, सिंधी, उर्दू, बोडो, कन्नड़, मलयालम, नेपाली, संस्कृत, तमिल, डोंगरी और काश्मीरी का उल्लेख मिलता है।

 

जबकि, इस देश में 72 उपभाषाएं हैं और बोलियां सैकड़ों है। इन सब में हिंदी ही हमारी स्वभाषा, मातृभाषा, राजभाषा और सर्वमान्य राष्ट्रभाषा है। उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण के इस वैश्विक दौर में बाजार की अवधारणा ने भी यह यह स्थापित कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी का बाजार सर्वसुलभ है । तभी तो विश्व स्तर पर डिस्कवरी और नेशनल ज्योग्राफिक के तमाम कार्यक्रमों में डब करना पड़ा है।

विकास एवं प्रगति की दौड़ में खेल व्यक्त करते हुए श्री वर्मा ने कहा कि हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी को ज्यादा तरजीह दी जा रही है। यह राष्ट्रीय स्तर पर विचारणीय है। क्योंकि, हिंदी की उपेक्षा करना भारतीय संविधान का अपमान है।

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