महिला सुरक्षा के संदर्भ में समाज सरकार और कानून सभी का समान रूप से योगदान अनिवार्य है: रामेश्वर प्रसाद वर्मा
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष:


न्यूज विजन। बक्सर
महिला सुरक्षा के मुद्दे का समाधान केवल कानून के माध्यम से संभव नहीं है। इसके लिए समाज के प्रत्येक सदस्य को अपने भूमिका समझनी होगी। सरकार को भी सचेत होकर सतर्क रहना होगा। ऐसी शिक्षा न केवल परिवार में बल्कि स्कूलों-कॉलेजों और विश्वविद्यालय में भी दी जानी चाहिए।
उक्त बातें वरीय अधिवक्ता सह प्रबुद्ध साहित्यकार रामेश्वर प्रसाद वर्मा ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के संदर्भ में प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कही। उन्होंने कहा कि महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में भी जागरूक किया जाना चाहिए। इसके लिए फिल्मों, टीवी कार्यक्रमों एवं अन्य माध्यमों के जरिए भी महिलाओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि महिला सुरक्षा एक जटिल मुद्दा है, जिसे केवल कानून शिक्षा या समाज के किसी एक हिस्से के प्रयास से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक समग्र और सामूहिक दृष्टिकोण की अनिवार्यता है। वरीय अधिवक्ता वर्मा ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के प्रति समाज के संवेदनशीलता बढ़ाई जानी चाहिए। कानून की शक्ति से पालन और त्वरित न्याय महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, ताकि महिला बिना किसी डर या भाई के अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें। उन्होंने यह भी संकेत किया है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भूमिका समझनी होगी और महिलाओं के प्रति सम्मान और समानता का दृष्टिकोण अपनाना होगा तभी हम एक ऐसा समाज बना सकते हैं जहां महिलाएं वास्तव में सुरक्षित महसूस कर अपने सपनों को सरकार कर सकें।
उन्होंने कहा कि समाज में बदलाव लाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपकरण शिक्षा है। स्कूलों, कॉलेजों एवं विश्वविद्यालय में युवा छात्र एवं छात्राओं को सामान्य मानवाधिकार पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। शिक्षा कवले अकादमिक नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें नैतिक और सामाजिक मूल्य का समावेश होना चाहिए। छात्र एवं छात्राओं को प्रारंभ से ही इमानदारी, समानता और सहिष्णुता के मूल्यों की भी शिक्षा दी जानी चाहिए। सरकार को समाज के बदलती जरूरतों के हिसाब से प्रगतिशील नीतियां बननी चाहिए इनमें समानता, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार लाने वाली नीतियां भी शामिल होनी चाहिए, तभी महिलाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे और लैंगिक भेदभाव जैसी रूढ़िवादी परंपरा की भी समाप्ति होगी।





