फैज मेमोरियल : 20वीं पुण्यतिथि पर विशेष | सिहर उठा था बक्सर, जब गोलियों से खामोश कर दी गई फैज की आवाज


अलोक कुमार
न्यूज़ विज़न | बक्सर
17 जनवरी 2006 की सुबह के लगभग दस बजे थे। जनवरी की ठंडी हवा के बीच बक्सर शहर अपनी रोजमर्रा की रफ्तार में था। लेकिन उस सुबह कुछ ही पलों में ऐसा हुआ, जिसने पूरे शहर को सन्न कर दिया। उस वक्त मैं प्रभात खबर समाचार पत्र में कार्यरत था। मेरे साथ हिंदुस्तान अखबार के फोटो जर्नलिस्ट अमित मिश्रा थे, जिनसे गहरी दोस्ती हो चुकी थी। अमित मिश्रा आरा से बक्सर आया-जाया करते थे और उनकी अनुपस्थिति में बक्सर से जुड़ी कई तस्वीरें मैं उन्हें उपलब्ध कराया करता था। उस समय हिंदुस्तान के प्रभारी अवनीश अगाध हुआ करते थे। और प्रभात खबर के ब्यूरो प्रभारी विवेक कुमार सिंहा।
17 जनवरी की उस सुबह हम दोनों बुनियादी स्कूल के समीप एक चाय की दुकान पर खड़े थे। आसपास के कुछ लोगों से बातचीत चल रही थी। तभी अचानक गोली चलने की आवाज गूंजी। आवाज सुनते ही हम दोनों का ध्यान ज्योति प्रकाश चौक की ओर चला गया। इसी बीच किसी ने कहा—“मर्डर हो गया है।” हम दौड़ते हुए ज्योति प्रकाश चौक की तरफ बढ़े। वहां का दृश्य आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। कुछ लोग गोली से घायल व्यक्ति को ऑटो में लादकर अस्पताल ले जाने की तैयारी कर रहे थे। जैसे ही हम वहां पहुंचे, पता चला कि वह कोई और नहीं, बल्कि फैज भाई थे। बताया गया कि फैज भाई बाइक पर पीछे बैठे थे, बाइक बॉबी भाई (जगदीश टेंट हाउस) चला रहे थे और दोनों नया बाजार की ओर जा रहे थे। ज्योति चौक स्थित गणेश ऑप्टिकल्स के सामने पहुंचते ही पीछे से किसी ने फैज भाई को टोका और बेहद करीब से गोली मार दी। गोली लगते ही फैज भाई सड़क पर गिर पड़े।
हमने घटनास्थल की कुछ तस्वीरें लीं और इसके बाद मैं और अमित मिश्रा बाइक से अनुमंडलीय अस्पताल, सिविल लाइन की ओर निकल पड़े। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते वहां हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। वजह साफ थी—फैज बक्सर का ऐसा नाम थे, जो हर गरीब, मजलूम और जरूरतमंद के लिए हमेशा खड़े रहते थे। जिला प्रशासन हो, पुलिस प्रशासन हो या फिर राजनीति का गलियारा—हर जगह फैज की अपनी पहचान थी। अस्पताल परिसर में उस समय शहर का हर चर्चित चेहरा मौजूद था। कुछ ही देर में तत्कालीन एसपी विनोद कुमार, डीएसपी और संबंधित थानों की पुलिस पूरी टीम के साथ अस्पताल पहुंच चुकी थी। जांच की प्रक्रिया शुरू हो गई थी।
फैज की हत्या ने पूरे बक्सर को झकझोर कर रख दिया था। उस दौर में कुछ लोगों ने इस हत्याकांड को उत्तर प्रदेश के चर्चित मोहम्मदाबाद विधायक कृष्णानंद राय हत्याकांड से जोड़ने की कोशिश भी की थी। हालांकि सच्चाई की परतें समय के साथ खुलती चली गईं, लेकिन फैज की कमी आज भी शहर महसूस करता है। 20 साल बीत जाने के बाद भी 17 जनवरी 2006 की वह सुबह बक्सर के इतिहास में एक काले अध्याय की तरह दर्ज है। फैज आज भी लोगों की यादों, दुआओं और इंसाफ की उम्मीदों में जिंदा हैं।





