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वैदेही वाटिका में प्रभु श्रीराम व जानकी के हुए नैना चार

वैदेही वाटिका लीला देखने के लिए श्री सीताराम विवाह आश्रम में साधु-संत और श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़

न्यूज विजन। बक्सर
नया बाजार स्थित श्री सीताराम विवाह महोत्सव आश्रम में बना भव्य पंडाल साधु-संतों और श्रद्धालुओं से खचाखच भरा हुआ था। महर्षि खाकी बाबा सरकार का 56वां निर्वाण दिवस पर आयोजित पुष्प वाटिका प्रसंग देखने के लिए मानों आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा हो। दिन के दस बजे से ही पंडाल में साधु-संत और श्रद्धालु डेरा डालने लगे थे। आश्रम के सेवक सभी आगंतुकों को पंडाल में उचित स्थान देकर बैठा रहे थे। पंडाल के बीचो-बीच आकर्षक अद्भुत वैदेही वाटिका का निर्माण किया गया था। वैदेही वाटिका की सुंदरता हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था।

 

 

पुष्प वाटिका का दृश्य और संवाद से मिथिला नगर का अहसास हुआ। देव पूजन के लिए गुरू विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण जी को पुष्प और तुलसी पत्ता लाने को कहते हैं। गुरू की आज्ञा मिलते ही प्रभु श्री राम और अनुज लक्ष्मण जी पुष्प और तुलसी पत्ता लाने के लिए वैदेही वाटिका पहुंचते हैं। पुष्प वाटिका में उन्हें जाने से मौजूद मिथिला के माली और मालीन उन्हें रोक देते हैं। प्रभु श्री राम वाटिका के माली, मालीन व रक्षक से बाग में जाने की अनुमति मांगते हैं। वे गुरू और देव पूजन के लिए कुछ पुष्प तोड़ लेने का आग्रह करते हैं। उसी क्षण मालीन मनोहर के पिता से कहती है। सुनते हैं। यह वही दोनों राजकुमार हैं, जिन्हें हमने अपने बगिया में पुष्प तोड़ते हुए सपना में देखा था। मनोहर के पिता कहते हैं। सपना की बात कहीं जाग्रत में दिखाई देती है क्या। जब वहां गये और दोनों राजकुमारों को देखा तो कहा। तुम्हारा सपना सच निकला। श्री सीताराम विवाह महोत्सव आश्रम के महंत श्री राजाराम शरण दास जी महाराज मुख्य माली के भूमिका निभा रहे थे। उनके साथ आश्रम के परिकर प्रभु श्रीराम और उनके अनुज लक्ष्मण जी को रिझाने के साथ ही विनोद पूर्ण बातों में उलझा रहे थे।

 

 

वैदेही वाटिका के द्वार पर खड़े दोनों भाई से वहां के माली और मालीन परिचय पूछते हैं। ऐ पथिक तेरो शुभ घर कहां है। कहां से आए हो और आने का उद्देश्य क्या है। उनके प्रश्नों का जवाब देते हुए श्रीराम ने कहा-पश्चिम देश के अवध नगरिया से आए हैं। वहां के महाराजा दशरथ जी के हम पुत्र हैं। मेरा नाम राम है और यह मेरा अनुज लखन है। हमें यहां महर्षि विश्वामित्र ने यज्ञ सफल कराने के लिए पिता जी से मांग कर लाए हैं। गुरू जी का यज्ञ सफल होने के बाद यहां धनुष यज्ञ देखने के लिए आए हैं। यहां सुंदर सदन में ठहरे हैं। गुरू जी के आज्ञा पर पुष्प लेने आए हैं। उन्होंने कहा कि आप मिथिला के माली बड़े ही रसिक हो। बातें बना हमें बातों में उलझाओ नहीं। गुरू पूजन के लिए पुष्प ले लेने दो। माली कहते हैं। पुष्प लेना एक बहाना है। मिथिला में हजारों वाटिका है। पुष्प लेने के बहाने हमारी किशोरी जी को देखने आए हैं। काफी तर्क के बाद माली कहते हैं कि सिया जी की जय बोलकर पुष्प वाटिका में चले जाइए। इस पर प्रभु श्रीराम कहते हैं कि यह मेरे मर्यादा के बाहर है। अाप सभी हमारे हैं। कहा जब प्रेम की दुहाई देते हो तो सुनो। मिथिला धाम की जय हो। मिथिला निवासी सभी नर-नारियों की जय हो कह वाटिका में प्रवेश कर जाते हैं।

 

वहीं माता जानकी अपनी आठ सहेलियों के साथ गौरी पूजन के लिए वाटिका में आती है। दूसरी ओर प्रभु श्री राम और लक्ष्मण जी पुष्प तोड़ने में लीन हो जाते हैं। पहली बार प्रभु श्री राम की नजर सिया पर पड़ती है और दोनों लोगों की नैना चार होती है। वहां सिया जी मन ही मन प्रभु श्री राम को अपना वर मान लेती हैं। उसके बाद सिया जी गौरी माता की पूजन करती है। माता गौरी उन्हें मनोकामनापूर्ण होने का आशीर्वाद देती है। उक्त प्रसंग देख साधु-संत और श्रद्धालु धन्य हो जाते हैं। श्रीनारायण दास जी भक्तमाली मामा जी की ख्याति देश ही नहीं वरन विदेशों में भी है। उनकी ख्याति का असर आज श्री सीताराम विवाह महोत्सव आश्रम में देखने को मिला।

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